Saturday, June 24, 2017

सभ्यता के चाक पर





एक.


धरती के सबसे गहनतम बिन्दु से
सारा धातु खींचकर
सभ्यता की
कोई एक कील बनाने में
पांव में चुभ जाता है जो इतिहास का कांटा,
उसे निकालने में
बूढ़े हो जाते हैं बुद्ध..
कनक बोते नानक
ठिठक कर ठहर जाते हैं और ज़मीन पर बैठ
माथा ठोंकते हैं
सभ्यता के उद्भव पर..
कृष्ण की बांसुरी
बजती है अपनी सबसे फीकी धुन में..
ठीक तभी एक बच्चा झींकता है
और रोटी के तन पर
गाया जाता है भूख का राष्ट्रगान..

________


दो.


नींद पलने दी जाती है
सपनों की बाज़ारी को
छप्पर के पीछे बहती
दूध की नदी शांत रहती है
पूर्व वैदिक काल के ऋषि
उत्तर वैदिक के उत्तरार्ध पर चिंतित हैं
चार में से तीन वेद रच कर
डाल दिये गए हैं सभ्यता की झोली में
एक बूढ़ा किसान दुःखी है
भविष्य में खोदे जाने वाले
मृतकों के टीले पर
जहाँ एक सभ्यता ने किया
दूसरी का तर्पण..
किसी सुबह कोई खोजी
टकरायेगा अपनी फूटी किस्मत यहाँ
और मुस्कुराएगा सोचकर
कि जैसे लोहा को लोहा काटता है,
और कुत्ते को कुत्ता,
वैसे ही इन्सान इन्सान को काट खायेगा..


________


तीन.


सो जाएंगे वो
जिन्हें अंधेरा आंख पर रखकर सोना होता है
चैन से..
जिन्हें सोने के लिए आंख मूंदने की ज़रूरत नहीं
जिनके लिए नज़र मिलाना
नज़र चुरा लेना होता है..

और मैं जागता रहूंगा
उम्र का चौकीदार होकर,
देता रहूंगा पहरा समय की परिधि पर..
मैं मलूँगा सम्बन्धों की राख
मृत हो चुके युगों की पीठ पर,
मुरझाये प्रेम की बातें जब पपड़ाकर झड़ती हैं;
मैं एक हमउम्र ढूंढूंगा
गर्म होकर ठण्डी हुई मिट्टी का..
मैं इंतज़ार करूँगा किसी एक रात
प्रलय की बारिश का,
और चाहूंगा कि इस सृष्टि,
बदल जाएं सभी पूर्व परिभाषाएं..

इस सभ्यता
मैं नहीं चाहूंगा
पशु से मानव हुए मानव के क्रम विकास का
मैं चाहूंगा मनुष्य से मनुष्य के मनुष्य होने को
या चाहूंगा बस उसका पशु ही रहना..


#शून्य


Monday, January 30, 2017

इच्छाएं



सोमेन्द्र विगत कई वर्षों से लिखते आ रहे हैं। उनकी रचनाओं में एक विचित्र सी सिहरन होती है जो पढ़ते हुए स्पष्ट महसूस की जा सकती है। वो लगातार सरोकारों के लिए लिख रहे हैं। प्रस्तुत हैं उनकी नवीनतम रचनाएं..


एक.

मुझे चाहिए
खिलते फूल,
पहाड़ पर डूबते सूरज को
ताकती भेड़ें,
रेतीले टीले पर अपने एकलौते
टोडीये*को संभालता रैबारी**
पीने जितना पानी,
बच्चे ना रोये उतना दूध,
पीली सरसों
और
शाम को घर लौटते हुए
मुस्कुराता आदमी,
चाहे स्वर्ग तब भी आसमान में रहे।



दो.

स्त्रियां तब भी मात्र उद्देश्य थी
जब नहीं थे लैंस,
एक लक्ष्य थी
जिसे पा सकने की क्रूर इच्छा
जो मिल जाने के बाद दया में बदल जाती।
कला नहीं थी,
कला का साधन थी।
प्रेम नहीं,
अधिकार थी।
आग नहीं,
लकड़ियाँ थी;
लकड़ियाँ कि जिनको कहा जाता रहा
प्रेम की पराकाष्ठा..
और सरसों से लेप कर
धकेल दिया जाता
देवी कहलवाने को।

स्त्रियां
अतिरिक्तता है
वो मिट्टी जो प्रकृति ने
अतिरिक्त रख दी
उसकी छाती पर,
प्रेम जो
प्रकृति ने अतिरिक्त दिया
उसे सभी को देने हेतु,
अतिरिक्त खून
जो स्तनों से दूध बन झरता है,
एक उदास तट पर
रेत है स्त्री
जो चर्चा का विषय नहीं है,
हमारी तुम्हारी
परिभाषाओं से उकताई औरत
मृत्यु से भी तंग आ चुकी है।
उसका सांस लेना अब
थकान है,
जिसमें हमारे प्रति सहानुभूति
सांत्वना और दया है
जिसे भय से भरे हम प्रेम मानते हैं।
आसमान का रंग जब तक नीला है
स्त्री तब तक धकेली जायेगी,

और नारीवादी मेरी जांघें
सहला कर पूछेंगे
कविता लिखते रहने को..


#सोमेन्द्र तालणिया


*टोड़ीया- ऊँट का बच्चा,
**रैबारी- ऊँटों की एक चरवाहा जाति, जो आजकल बस जाति है।