Saturday, August 6, 2016

औरतें

औरतें



एक

ईंट-सीमेंट की
इमारत के भीतर
सजावट का एक अवयव
जो अस्थि-मज्जा और
गर्म रुधिर रखने वाली
चलती फिरती प्रेतनियों से
किसी तरह कमतर नहीं;
कार्यशाला पर सहकर्मियों की
आँखों को गर्माहट का सकून देती,
जीभ और दिमाग को
'ताज़ा करने वाली' बातों का
विषय देती औरत महज़
पति के काम से लौटने पर
बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों और
रोज़मर्रा की धूप/धूल में
काम करने से फीकी हो चली मुस्कान के
साथ दरवाज़ा खोलने वाला एक चेहरा है
जो एक सौ चार डिग्री देह ताप के साथ
बच्चे को स्कूल भेजने की ज़िम्मेदारी भी है और
बैड-पैरेन्टिंग के लिए दिया जाने वाला
उलाहना भी,
वो अक्सर रात को शराब पीकर आये
पति को भुने मन से
गर्मागर्म भोजन परोसने वाली
माइक्रोवेव ओवन भी है और
अनमने मन के साथ
पति/प्रेमी की यौनेच्छाओं को
चरम प्रदान करती आह भी..

इतना कुछ होने के बाद भी
स्त्री यदि कुछ नहीं है तो
एक शरीर के जंगले से झांकती आत्मा जो
किसी सन्ताप के साथ
स्वप्नदर्शी होना जानती भी है तो
निर्धारित सीमारेखाओं में ही..


दो

घर की औरतें
एक साथ नहीं बैठतीं
तन मन की
कह लेने को कभी..

रसोई में चूल्हा सम्भालती,
भांडे मांजती,
मेहमान के
स्वागत-सत्कार के बहाने
या कपड़े धोने, सुखाने के बीच
पुराने सन्दूकों से
कपड़े निकालने-रखने में
वे उस बात को भी
कह-सुन जाती हैं
जो कभी अपने आप को भी नहीं कहती,
जो कभी अपने आप से भी नहीं सुनती..


#राहुल