Saturday, June 11, 2016

चश्मे का फ्रेम

    काफ़ी समय से सोच रहा हूँ कि चश्मे का फ्रेम बदलवा लूँ। पुराना भी हो चला है और ओल्ड फ़ैशन्ड भी। तुम्हें भी तो अच्छा नहीं लगता.. याद है, एक बार तुमने जान-बूझकर बिस्तर पर रखे चश्मे को खिसका दिया था, ये सोचकर कि मैं उसे ढूंढ न पाऊँगा, और तुम उसे ढूंढने के बहाने ही.. ज़रा सा समय मेरे साथ, मेरी छोटी परेशानियों में बिता सकोगी.. पर मैं उसी पर धम्म से बैठ गया था.. परेशान तो हुआ था.. डण्डी तिरछी जो हो गई थी फ्रेम की.. घण्टों कसरत कराई इसने.. हाथ की भी और ज़बान की भी। तुम्हारी शरारत पर ज़रा सी झिकझिक के बाद जब शाम को लिखने बैठा तो महसूस हुआ शायद नम्बर गिर गया है चश्मे का.. कुछ धुंधला दीखता है। जाने तुम्हें कैसे पता चल जाता था.. कभी जब बड़बड़ाते हुए घर में घुसता और अपनी चीजें ढूंढता तुम्हें कैसे पता चलता कि तुम्हारा साथ चाहिए बस.. सब बड़बड़ कैसे खिलखिला उठती है..

    तुम्हारे जाने के बाद लिखने का मन सा नहीं करता। यूँ नहीं कि आलस है,.. बस लिखने बैठता हूँ तो तुम्हारा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। तब न कलम उठती है, न दिमाग सोच ही पाता है। इरा का कल रात फोन आया था.. वहीं बैंगलोर में नौकरी मिल गई है उसे। तीन महीने बाद ही आना हो पायेगा उसका। तुम्हारे घुटनों का दर्द कैसा है अब? शाम को लॉन में अमलतास के नीचे थोड़ा वक़्त बिताता हूँ.. जब तुम छोड़ कर गईं थी, छोटा सा बच्चा था। आजकल हट्टा-कट्टा है.. अच्छा बाबा, नहीं लगाता नज़र.. हाहाहा.. वैसे भी मेरी नज़र लगती ही कहाँ है। पहले शाम को तुम्हारे साथ तुम्हारे बगीचे में टहल लिया करता था, अब तुम्हारा बगीचा रोज़ शाम मुझमें टहलने आ जाता है। मेरी किताबें तुम्हारे सामने भी फैली रहती थीं, अब भी बिखरी रहती हैं.. मेरी तरह। तब उन्हें इसलिए नहीं सम्भालता था कि उन्हें रखने के बहाने शेल्फ़ में रखी किताबों के पीछे मेरी सिगरेट की डिब्बी पकड़ने में जो शेरलाक होम्स जैसा महसूस करती थी और उसके बाद मेरी माँ की तरह जो डाँटती थी, अब उसकी कमी खलती है। सिगरेट वहीं उसी शेल्फ़ में पड़ी हैं, किताबों के पीछे। अब कोई नहीं डाँटता। इरा के आने से पहले सफ़ाई करूँगा, तब हटा दूंगा। मुझे डांटने में वो भी तुम पर गई है बिलकुल। कमरों में तुम्हारी आहटें, तुम्हारे उलाहने बिखरे पड़े हैं.. एक बेचैनी से बीनता हूँ इन्हें।

    ताले बन्द करते वक़्त ज़रा देर दरवाज़े पर खड़ा रहता हूँ.. जाता भी नहीं हूँ। लगता है तुम अब बोलोगी, "खींच कर देखो एक बार.." जाने से याद आया कभी कभार जीत के पास चला जाता हूँ। मेरा हाथ देखकर बताता है कि लम्बी रेस का घोड़ा हूँ.. अभी दस बरस कहीं नहीं जाऊंगा। लगता नहीं.. तुम्हारे बिन रुका थोड़ी हूँ इतना कहीं। वो भी जानता है ये बात। शायद मुझे कह नहीं पाता होगा। चाय में शक्कर नहीं लेता.. बेख्याली अजीब मिठास घोले रखती है आजकल। तुम्हारे सामने भी अजीब होता हूँ.. यों ज़बान नहीं खुलती, और यों बड़बड़ाता रहता हूँ.. तुम्हारे जाने के बाद यूं तो ध्यान रखता हूँ अपना, पर नज़रें धुंधलाने लगी हैं अब। आँखें टेस्ट करा कर सोचता हूँ, फ्रेम भी बदलवा ही लूँ.. इसकी डण्डी भी तुम्हारी उंगलियों सी ही हैं.. टँगी रहती है कानों पर। 

16 comments:

  1. अति उत्तम ,पहले से और निखरी हुई,ऐसे ही तरक्की करते रहो राहुल भाई ......welldone

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  2. Outstanding.....
    Detailing Kitne achhe se ki Hai drashya aankho ke saamne ghoom jaate hain....
    Aap mere favorite Yun hi nahi hain lajawaab likhte hain..
    Likhte rahiye 💐💐

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    1. बहुत धन्यवाद बन्धु..

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  3. though i don't knw u at all, but it reminds me of main yahan tu wahan. .n i knew its still far more better thn any1 can ever imagine!!
    Beyond beautiful it is. . . . <3

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    1. Thanks for your beautiful comment snigdh ji..:)

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  4. बहुत खूबसूरत लिखा है..पिक्चर पोस्टकार्ड जैसा

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    1. शुक्रिया वकील सा'ब..

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  5. कहाँ हैं चरण आपके.... दो ही हैं या शीश के अनुपात में बीस हैं?
    किसे धोना है? किसे स्पर्श करना है?
    सोच की ये ज्ञान गंगा किस धरा पर किस पर्वत श्रृंखला पर है... स्नान कर के ही पुण्य प्राप्त कर लूँ
    शब्दों पर नहीं इनके भाव पर जाइयेगा दशानन महाराज...
    धृष्टता की क्षमा
    #मासूम हूँ भाव में बह जाता हूँ।

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    1. हृदय लग जाइये, वह एक ही है.. आपको बहुत धन्यवाद इस अगाध स्नेह हेतु..

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  6. एक लंबे अंतराल के बाद ऐसा कुछ पढ़ा है जो ज़ेहन में ठहर सा गया... एक तस्वीर बन गयी है जिसमे अभी कुछ ही रंग भरे गए हैं.. उम्मीद है आप ऐसे ही इस तस्वीर में अपनी लेखनी के ज़रिये रंग भरते रहेंगे।

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