Monday, April 25, 2016

जाने किस वक्त

एक.


कोई जामुनी रात
किसी रोज़ जब
अपने शामियाने के
छोर जोड़
उसे तह कर रखने को होगी,

जब सूरज की
पहली रौशनी
आधी दुनिया की
आखिरी अंगड़ाई का
साक्ष्य बन रही होगी;

मैं चुपचाप छोड़ रहा हूँगा
तुम्हारी दुनिया..

निःशब्द..

तब नहीं बचा होगा कुछ
सिवाय एक बर्फ़ीली विवशता के..


दो.


वो कौन सा वक़्त था
दौड़ आती थीं जब
नर्म हवाएँ
बेसबर इंतज़ार को रौंदती..

जब पांव के छाले
आंसू तले दब
सतरंगी हुए जाते थे..

वो आकाशगंगायें जब
हथेलियों में बन्द होतीं,
मेहँदी ख़ुशबू बिखरती..

जाने कौन सा वक़्त होता
जो क़यामत लगता था,
खुलते जूड़े के
भँवर से फिसलकर..

कोई शाम बिखरती थी
टकराकर क्षितिज के
प्रदीप्त सूर्य से,
कोई रात चाँद सिरहाने
धरे जाती थी..

वक़्त होता तो बदल जाता,
मौसम होता तो पलट जाता..

जाने वो कौन सा वक़्त था
जब मैं तुममें रह जाता
जाने कौन सा मौसम था
जब तुम मुझमें रह जातीं..



#राहुल

15 comments:

  1. हमेशा की तरह उत्तम ,अति उत्तम ,अति अति उत्तम .....खुश रहो ,ऐसे ही लिखते रहो

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  2. शानदार!ज़बरदस्त!ज़िंदाबाद!

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  3. शानदार!ज़बरदस्त!ज़िंदाबाद!

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    1. धन्यवाद आपकी इस जोशीली प्रतिक्रिया के लिए..

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. खुद को उस दुनिया मे खड़ा पाती हूँ.. जो तुम कविता मे रचते हो..अद्भुत लेखन

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    1. आभार उज्ज्वल जी.. :)

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  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 27 मई 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
    

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    1. धन्यवाद विभा जी..:)

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  7. जाने वो कौन सा वक़्त था
    जब मैं तुममें रह जाता
    जाने कौन सा मौसम था
    जब तुम मुझमें रह जातीं..
    सुन्दर पंक्तियाँ !आभार। 'एकलव्य'

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