जीवन युगों तक

एक.

कांपते हाथ यदि
स्थिर नहीं हुए हैं,
लड़खड़ाती जीभ
सन्तुलित होकर
शांत नहीं हो गई है,
जम नहीं गए हैं
थरथराते पाँव
किसी प्रतिमा के
आधार की भांति;
रुधिर नहीं होता जिसमें।
सांसें रुक न जाएँ,
आती जाती रहें अगर
रोशनदान से होकर
गुज़रती हवा की भांति,
तो स्मरण रहे;

जीवन का उद्देश्य
जीवित बचता है अभी..

रहती हैं
सांसों की किश्तें,
चुकानी हैं जो..
बड़ा मूल्य देकर..


दो.

पल पल
बदलती
दुनिया में
देखता रहा हूँ
स्वयम् को भी
बदलते हुए..

एक ही नाम और
मनचाहे विशेषणों से
जानती रही है दुनिया मुझे
मैं अनेक रहा..
ज़िंदा रहा..

अनगिनत शवों को
देह से
अलग करने के बाद भी
नहीं मरा,

जीता रहा हूँ..

जीता रहूंगा भी
धमनियों में
रक्त का प्रवाह
जम जाने से पूर्व तक..
युगान्त तक..


#राहुल

Comments

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  3. जीवन का मूल्य जीवन के अन्त तक-- सचमुच

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    1. आभार चेतना जी..:)

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  4. अलग स्तर है आपकी लेखनी का,किसी अत्यंत गहरी ध्यान अवस्था की अनुभूति होती है,अगर आपसे व्यक्तिगत बात नहीं हुई होती तो यूँ लगता मानो राजस्थान बोर्ड के दसवीं कक्षा की हिंदी की किताब में से कोई कविता पढ़ रहा हूँ।

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    1. आपसे सराहना पाना अच्छा लगता है.. बहुत धन्यवाद.. :)

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    2. Fantastic☺...stay blessed .....ऐसे ही लिखते रहो☺

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    3. Fantastic☺...stay blessed .....ऐसे ही लिखते रहो☺

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  5. Replies
    1. धन्यवाद मनोज जी.. :))

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  6. बहुत बहुत बहुत सुंदर___कुछ रचनाएँ होती इतनी खुबसूरत है की बार बार पढ़ने का मन करता है यह भी उन्हीं में से एक है~!!! :)

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद दीदी.. आपका पढ़ना अच्छा लगता है, सराहना प्लस वन..:))

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  7. वैसे तो पूरी रचना ही लाजवाब है, पर निम्नोक्त पंक्तियों के बाद जो रचना ने उड़ान ली कि बस "roller coaster" का घर बैठे आ गया !
    एक ही नाम और
    मनचाहे विशेषणों से
    जानती रही है दुनिया मुझे
    मैं अनेक रहा..
    ज़िंदा रहा..

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    1. बहुत आभार बन्धु.. आपकी प्रतिक्रिया निश्चित ही महत्त्वपूर्ण होती हैं.. कोटिशः आभार।

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  8. ये रचना तो थी ही इतनी खूबसूरत की इसको अपनी आवाज़ देने की गुस्ताखी की भी कर दी थी मैने।
    लाज़वाब...
    ढेर सारी शुभकामनाएं लिखते रहिए।

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