Wednesday, January 13, 2016

जीवन युगों तक

एक.

कांपते हाथ यदि
स्थिर नहीं हुए हैं,
लड़खड़ाती जीभ
सन्तुलित होकर
शांत नहीं हो गई है,
जम नहीं गए हैं
थरथराते पाँव
किसी प्रतिमा के
आधार की भांति;
रुधिर नहीं होता जिसमें।
सांसें रुक न जाएँ,
आती जाती रहें अगर
रोशनदान से होकर
गुज़रती हवा की भांति,
तो स्मरण रहे;

जीवन का उद्देश्य
जीवित बचता है अभी..

रहती हैं
सांसों की किश्तें,
चुकानी हैं जो..
बड़ा मूल्य देकर..


दो.

पल पल
बदलती
दुनिया में
देखता रहा हूँ
स्वयम् को भी
बदलते हुए..

एक ही नाम और
मनचाहे विशेषणों से
जानती रही है दुनिया मुझे
मैं अनेक रहा..
ज़िंदा रहा..

अनगिनत शवों को
देह से
अलग करने के बाद भी
नहीं मरा,

जीता रहा हूँ..

जीता रहूंगा भी
धमनियों में
रक्त का प्रवाह
जम जाने से पूर्व तक..
युगान्त तक..


#राहुल