Saturday, October 10, 2015

सुलगती बर्फ़

सुलगती बर्फ़


एक.


हवा बहने लगी
सरस फिर..
पन्छी चहके,
देह सप्राण हुई;
भान हुआ जीवन
दौड़ने का
धमनियों में
एक बार पुनः..

हर कर्म सृष्टि का
चलने लगा नियत
गति, नियम से..

शब्द भी उन्मुक्त हो
छूट चले
अनन्त आकाश में,

जुड़ी रह गई जो
दो जोड़ी आँखें
वो फिर,
जुदा न हो सकीं..


दो.


घर की छत से
चिपकी बर्फ़
अभी बूंदें बनकर
गिरना शुरू
नहीं हुई है,
घण्टाघर से दिखती
चांदी की हिमवर्तिका
पिघलकर बहना
शुरू नहीं हुई है..

शाम का धुंधलका
गहराते बादलों सङ्ग
रात हो चला है
शून्य टकराकर
वापस लौटता है देह से..

तुमने इसे नहीं छुआ,
रक्त दौड़ना
शुरू नहीं हुआ;

देह जड़ है अभी..


#राहुल

16 comments:

  1. एक बेहतरीन विचारों की प्रकाशवान लड़ी है, आपने चन्द पंक्तियों में गहरी बात कही है ! और वो क्या कहते हैं आखिरी में, इस रचना के सृजन लिए आपको साधुवाद ;-)

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    1. रचना सराहने हेतु सहस्र आभार बन्धु.. :)

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  2. अच्छी रचना है। आगे बढ़ें। सफल हों, यही कमाना है।

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    1. बहुत आभार जगदीश जी.. शुभकामनाओं हेतु धन्यवाद।

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  3. बहुत सुन्दर राहुल

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  4. बहुत सुन्दर राहुल

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  5. बहुत सुन्दर राहुल

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    1. धन्यवाद दीदी..

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  6. "देह जङ है अभी", बहुत सुन्दर ।

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    1. धन्यवाद श्वेता जी.. आप सरीखी शानदार लेखिका से प्रतिक्रिया पाना उपलब्धि से कम नहीं.. बहुत आभार..

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  7. आपकी रचनाशीलता हमेशा प्रभावित करती है. अबकी बार भी आपने शब्दों को गहरे अर्थ दिए है. शुभकामनाएं.

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    1. बहुत धन्यवाद सर.. आपकी प्रतिक्रिया सदैव अर्थपूर्ण रहती है.. पुनः आभार।

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  8. शानदार रचना......ऐसे ही लिखते रहे और आसमान को छू ले 👍👍👍👍👍👍

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  9. शानदार रचना......ऐसे ही लिखते रहे और आसमान को छू ले 👍👍👍👍👍👍

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  10. दो जोड़ी आंखें जो फिर भी जुदा ना हो सकीं।
    ......
    कत्ल की हद वाला
    रूमानी।
    वाह

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    1. बहुत आभार बन्धु..

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