Saturday, October 10, 2015

सुलगती बर्फ़

सुलगती बर्फ़


एक.


हवा बहने लगी
सरस फिर..
पन्छी चहके,
देह सप्राण हुई;
भान हुआ जीवन
दौड़ने का
धमनियों में
एक बार पुनः..

हर कर्म सृष्टि का
चलने लगा नियत
गति, नियम से..

शब्द भी उन्मुक्त हो
छूट चले
अनन्त आकाश में,

जुड़ी रह गई जो
दो जोड़ी आँखें
वो फिर,
जुदा न हो सकीं..


दो.


घर की छत से
चिपकी बर्फ़
अभी बूंदें बनकर
गिरना शुरू
नहीं हुई है,
घण्टाघर से दिखती
चांदी की हिमवर्तिका
पिघलकर बहना
शुरू नहीं हुई है..

शाम का धुंधलका
गहराते बादलों सङ्ग
रात हो चला है
शून्य टकराकर
वापस लौटता है देह से..

तुमने इसे नहीं छुआ,
रक्त दौड़ना
शुरू नहीं हुआ;

देह जड़ है अभी..


#राहुल