Wednesday, July 22, 2015

अम्मा जी के भगीरथ

अम्मा जी के भगीरथ


   बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखूं। अवसर, लेखनी और करीबी जब प्रेरित करते हैं तो शब्द सहसा फूट ही पड़ते हैं। फिर लिखते, न समय का भान रहता है न माहौल का। खैर.. अधिक भूमिका न बांधते हुए सीधे मुद्दे पर आता हूँ। लिखने का निश्चय किया तो मन में आया कि कैसे कल्पना करूँ.. कैसे विषय तलाशूं.. फिर सूझा, यथार्थ से श्रेष्ठ कभी कुछ नहीं हो सकता लिखने को।

   स्थान के नाम का उल्लेख नहीं कर रहा हूँ..  सोचता हूँ कि स्थान नाम लेने से घटना व उसकी प्रासंगिकता सीमित हो सकती है।

    आज गंगा-दशहरे के दिन जिले के कलक्टर साहब के सम्मान समारोह में मंच लगाया गया है। दर्शक-दीर्घा की प्रथम पांत में गाँव के भूतपूर्व सरपंच व उनका परिवार, शहर कोतवाल महोदय तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति बैठाये गए हैं। बैरिकेडिंग की गई है जिसके पीछे गाँव के लोग बड़ी संख्या में अपने जिलाधिकारी को देखने, सुनने आए हुए हैं। गाँव में सरकारी अस्पताल का शिलान्यास करने का उनका कार्यक्रम है साथ ही जिलाधिकारी महोदय का सम्मान भी गाँव की ओर से रखा गया है। दरअसल कलक्टर साहब गांव के भूतपूर्व सरपंच के सुपुत्र हैं। कुछ सात-आठ साल पहले गाँव से बड़ी पढ़ाई करने शहर चले गए थे। तब से सारा परिवार शहर ही रहता है।

   अचानक कलक्टर साहब मंच पर नमूदार होते हैं और उनके साथ सफ़ेद चिट्टी साड़ी में गौरवर्ण एक अम्मा जी हैं जिनको देखकर सबके ज़हन में कब की दफ़न एक कहानी ताज़ा हो जाती है। कई साल पहले उन्हें गाँव से निकाल दिया गया था। अम्मा को गाँव से निकाले जाने के बाद से अब तक किसी ने कभी उन्हें इस तरह नहलाये धुलाये हुए.. नए कपड़ों में नहीं देखा था।

     उनका नाम क्या था, कोई जानता नहीं था या लेता नहीं था या लेना नहीं चाहता था..नहीं पता.. कुछ पैंतीस एक साल हुए इस घटना की शुरुआत होती है। उनको सन्तान नहीं थी। पति की भी असामयिक मृत्यु हो चुकी थी। जैसा निःसन्तान स्त्री से अपेक्षा की जाती है, कि उन्हें बच्चों से चिढ़ होगी इसके उलट बच्चों से बड़ा लगाव था उन्हें। अचानक गाँव में महामारी हुई। बच्चों की मौतें होने लगी। उन्होंने अपनी तरफ़ से बच्चों का उपचार करने की बड़ी कोशिश की मगर पंचायत में उन्हें दोषी ठहराकर हुक्का पानी बन्द करा दिया गया; वजह नहीं पता, ऐसा क्यों हुआ। खैर.. मौतों का सिलसिला अभी रुका नहीं और उन्हें डायन करार देकर पत्थर मार-मारकर गाँव से बाहर निकाल दिया गया। सारा गाँव उन्हें अब डायन कहता था। तबसे उनका ठिकाना गाँव से बाहर वाला मन्दिर ही था। उनसे डरकर गाँव की महिलाओं ने उस ओर बच्चे भेजने बन्द ही कर दिए थे। इन वर्षों में गाँव के कुछ बच्चे चोरी छुपे उन तक खाना पहुंचाते रहे। लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव इस दौरान कभी नहीं दीखा। किसी ने बच्चों को मन्दिर की ओर देखा तो सख्त हिदायतों, नसीहतों के साथ कभी कभी थप्पड़, चप्पल या डण्डी से ख़बर ली जाती थी। लेकिन बच्चों का मन्दिर उनके पास जाने का क्रम नहीं रुका। अब तक बच्चे उन्हें 'मन्दिर वाली अम्मा' कहकर बुलाने लगे थे.. पर लोगों के कानों और मुँहों से सफ़र करती अम्मा की कहानी में कुछ भी नहीं बदला।

   यह घटना अब तक किस्सा बन चुकी थी। लोगों की कानाफूसियों के बीच कलक्टर साहब अम्मा को कुर्सी पर बैठाकर उनके बराबर वाली कुर्सी पर बैठते हैं। सम्मान के बाद कलक्टर साहब को दो शब्द बोलने को आमन्त्रित किया जाता है। अम्मा की तरफ़ देखकर, मुस्कुराकर कलक्टर साहब माइक सम्भालते हैं और कहते हैं, " आज बहुत ख़ुश हूँ जिसके लिए शब्द थोड़े हैं। वर्षों बाद मैं उस मिट्टी की गोद में हूँ जहाँ खेल-कूदकर बड़ा हुआ। गाँव में सरकारी अस्पताल की कमी थी.. पूरी करना चाहता था। पूरी कर भी दी आज। आपको आज अस्पताल के साथ वो वजह भी देता हूँ जिसने मुझे इस ओर प्रेरित किया.. अम्मा। अम्मा वो वजह हैं जिन्होंने मुझे सही मायनों में सिविल सर्विस करना सिखाया। अम्मा यहां मंच पर मेरे साथ हैं, इन्होंने अपना सारा जीवन इस गाँव को दिया है। कहने को सारा जिला मेरे अधीन होता है, इसीलिए अपने गाँव की तरफ़ से.. अपने पिता.. परिवार की तरफ़ से होने वाले इनके अपमान के लिए मैं इनके चरण छूकर क्षमा मांगता हूँ।" कहते हुए कलक्टर साहब की आवाज़ भर्रा गयी थी और वो अम्मा के चरण छू रहे थे। वो दृश्य सबने देखा जब अम्मा का हाथ कलक्टर साहब के सर पर जा पहुंचा और उनकी आँखों से मानो गंगा छूट पड़ी हो पर चेहरे के भाव अब भी शून्य थे। जनसमूह सन्न था। वहीं खड़े होकर कलक्टर साहब फिर बोले, "जिस माँ की गोद में हम पल-खेलकर बड़े हुए, जब उस माँ को सामूहिक रूप से अपमानित किया गया तब कुछ नहीं कर पाये। आज जब इस योग्य इनके आशीर्वाद से बने हैं तो इन्हें इनका खोया सम्मान ज़रूर वापस मिले। मैं आप सबको बताता हूँ यदि ये वो होती.. जो गाँव ने इन्हें सारी उमर बोला.. समझा तो आज मैं आप सबके सामने न होता। रोज़ाना दिन में एक बार इन्हीं के हाथ से भोजन कर इनके बारे में देखा.. समझा। जब सारा गाँव बच्चों की मौतों से परेशान था तो इन्होंने अपने हाथों से दवाइयाँ बना कर बच्चों को बचाने की कोशिश की। मैं आप सबसे पूछता हूँ क्या किसी की उस तपस्या का फल उसे अपमानित करके दिया जाना चाहिए.." आज पण्डाल में मौजूद हर शख़्स जो उस घटनाक्रम से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़ा रहा, शायद अपराध-बोध था उसको.. निरुत्तर थे सब। केवल कलक्टर साहब का चेहरा तेज से दमक रहा था। ऋण-मुक्त होने का गौरव था आज उनके मुख पर.. बोले, " आज गंगा दशहरा के दिन यदि माता के ऋण को चुका पाया तो जीवन सफल समझूँगा.. ये अस्पताल इन माँ को समर्पित करता हूँ.. चाहता हूँ कि इनके हाथों से ही इस पुण्य-कर्म का शुभारम्भ हो.. साथ ही यह भी चाहूँगा कि यहां मरीजों को ठीक करने का ज़िम्मा ये सम्भालें। अस्पताल की केयर-टेकिंग के लिए मैं इन्हें आमन्त्रित करता हूँ।" अम्मा जी के चेहरे पर प्रथम बार मुस्कान दिखाई दी पर आंसुओं के साथ।

   लगता था कि आज अम्मा जी के आंसू नहीं साक्षात् गंगा मैया प्रवाहित हो रही हैं। अम्मा बरसों से रुके अपने आंसू जाने क्यूं नहीं रोक पा रही थी। आज अम्मा के आंसुओं में उनका दुःख, उनका अपमान, शायद सब बह जाने वाला था.. बचने वाला था तो बस गंगा की सी निर्मलता लिए अम्मा और अपने बाप-दादाओं के किये अपराधों के क्षमापन पर अम्मा को सम्मान गाँव वापस लाने वाले कलक्टर साहब।

    सच मायनों में हुए न कलक्टर साहब "अम्मा के भगीरथ.."



#राहुल

Sunday, July 5, 2015

खड़ा मिलूंगा मार्ग में

खड़ा मिलूंगा मार्ग में

एक

खड़ा मिलूंगा
भरे तूणीर और
खिंची प्रत्यंचा के साथ,
मार्ग के अवरोध
अब और नहीं
रोक सकते
कठोर प्रहार मेरे
बहुत हो चुका
प्रलाप समय का..

सहस्रों बार
पहले भी
नियति के
निष्ठुर प्रलोभन दिखा
छला जा चुका मुझे..

राह में अब
न सागर, न ही शैल
रोक सकते
बाणों के कठोर प्रहार
यही अब
प्रतीक होगा
प्रेम की सज्जता का
जिसे धारण कर
बन अर्जुन
साथ रहूंगा
हर जन्म मैं..


दो

मिलता तो हूँ तुम्हें
जब सीमायें, वर्जनाएं,
थाम नहीं पातीं,
प्रवाह सा
छूट जाता हूँ
किसी नदी के
जो सभी किनारों,
बांधों को तोड़
जा मिले
अपनी नियति से..

तब कहाँ स्वयम् रहता हूँ..
तुम सा हो जाता हूँ,
तुम हो जाता हूँ
तुममें डूब कर..


कभी न पृथक् होने के लिए..



#राहुल