Sunday, June 14, 2015

बादल




एक

रात को आया
रुई का एक फाहा
खिड़की पे
चाँद के साथ

ठहरा रहा कुछ पल
आती जाती हवाओं से
उलझा.. टूटा..
ख़ुद से छूटा

तुमने देखा तो
बादल बन गया।




दो

बारिश की
सैकड़ों बूंदों से
अनछुआ
हथेली पर
एक स्पर्श
मात्र तुम्हारा..

भिगा जाता है
किसी को
मुझी में

तकता रह जाता है
बादल आसमान से
सूखा सा..


तीन

आँखों के
फैले काजल से
सफेद चमकती
चादर पर खींच
कुछ बादल
जो भेजे थे तुमने
शहर के ऊपर से
निकल गए..

एक बार फिर
उन्हें स्पीड-पोस्ट से
भेज दो न..


#राहुल