Friday, May 22, 2015

ख़्वाहिश सूरज की

ख़्वाहिश सूरज की


एक

कमरे का ताप
बढ़ सा गया है
बीते कुछ दिनों में,
पसीना हसरतों का
छूटते जाता है..

ज़र्द हिस्सों में
उड़ता मैं पतँगों सा..
बंटा ख़ुद ही की
ख्वाहिश में..

एक सूरज जलाकर
रखा था दीये में
उजालों के लिए..



दो

अजीब है
रात का होना,
उससे भी अधिक
सुबह का होना..

एक सूरज की 
बाट देखती रात
ढलना चाहती है अब..

सितारों के
बोझ तले दबकर
यूँ कुछ कि फिर
कोई रात न हो..

          
#राहुल

Sunday, May 17, 2015

विदाई का सूर्य

विदाई का सूर्य

एक

किसी पिघलती
शाम में दूर
क्षितिज पर,
जिस पल सूर्य
उद्यत होता है
समुद्र के जल में
समाहित होने को..
चलता जाता है वह
प्रतिपल निरन्तर जैसे
घर जाने की जल्दी में..

सूर्य को उस
विदा करते पल भी,
किनारों की
गीली रेत पर
रह जाते हैं,
मूक प्रत्यक्ष-दर्शी बन
दो जोड़ी पांवों
के निशान..
धीमे धीमे जो
बढ़ते जाते
एक दूजे की ओर
एक होने को..

दो

आओ बैठो
पास मेरे
ये खाली कुर्सी
खींचकर..

काफी दिनों से
कुछ धूप
इकट्ठा कर
रखी है
बोतल में।

एक सूरज
पड़ा है वहां
कोने में किसी,
अपनी टूटी
किनोरों के साथ..




#राहुल

यात्रा का सम्भाव्य

यात्रा का सम्भाव्य

न तारों की छाया
न सूर्य की धूप ही
किसी पथिक की
यात्रा के अन्वेषक बन
तय कर पाते हैं
यात्रा का सम्भाव्य..

ये तो निर्भर है
मात्र पथिक की
लकुटी के साहस
और बटोही का
गन्तव्य के प्रति
उसे प्राप्त करने के
प्रयोजन पर..

अनिच्छित इच्छित
प्रतिकूल अनुकूल
हो जाएँ.. विषमताएं
सब गम्य हो जाएँ
यदि लक्ष्य को
प्राप्त करना
नैसर्गिक हो,
बिलकुल किसी
सूर्य के ताप
प्राप्त करने जैसा
या तारों के
शीतल छाया
चुनने जैसा..

#राहुल

Saturday, May 16, 2015

तुम

तुम


एक दायरा सा होता है लोगों का.. मेरे चारों तरफ.. एक हुजूम; जब तुम करीब होती हो.. यादों में ही सही। फिर कोई आश्चर्य नहीं कि अचानक इतना खालीपन.. तुम्हारे करीब न होने की सोच से भी। इतना तो बनता है, जब अचानक सारी दुनिया तुम अकेले को किसी मरु, निर्जन वन या टापू पर छोड़कर चली गयी हो। समस्त विश्व का खालीपन उस समय मेरे चेहरे की नीरवता से प्रकट होता है। जहां समुद्र हैं, मगर सूखे.. पर्वत हैं, किन्तु झुके.. कोलाहल है, किन्तु अश्रुत। चन्द्र है, सूर्य है, नक्षत्र हैं.. पर निस्तेज। बड़ी विचित्र दशा। ऐसे में कोई हाल पूछे तो क्या बताऊँ समझ से परे है।

Saturday, May 9, 2015

माँ

माँ

छत पर
खाली पड़े
टब में
चार बिलोटने
दिए बिल्ली ने
दो एक रोज़ पहले..
उछलते थे
कूदते थे
मिमियाते,
गुर्राते थे,
लड़ते थे
अपनी माँ
के संग..

कुछ बीमार से
हैं कल से..
उछलना
कूदना
खेलना
खो सा गया कहीं..
न खाते हैं
न पीते हैं
ग़ौर किया
तो पाया
बिन माँ
के हैं..

बिल्ली शायद
चली गयी है कहीं..

#राहुल

Monday, May 4, 2015

आत्मगीत

आत्मगीत


कुछ धुनें
रख ली हैं
चुराकर
शब्दों से
तुम्हारे,
कहे थे
जो कभी
किसी
युग में
कानों में
मेरे..

आज,
युगों बाद
भी सहेज
रखे हैं
प्रतीक्षा में,
तुम्हारे श्वासों
की उष्णता की;
आतुर हैं मेरे
कानों से
पिघलकर
अंतर तक
जाने को
बन कर
मेरा आत्मगीत।


#राहुल