Friday, April 24, 2015

क्या पता

क्या पता

सुबह कल की
सुनहरी हो
क्या पता..

रात आज
कितनी गहन हो
क्या पता..

चाँद का साथ
नहीं लाज़िम,
सितारे भी संग रहें
क्या पता..

दिन गुज़रे तो
एक अरसा हुआ,
रात भी कट पायेगी
क्या पता..

#राहुल

भोर की प्रतीक्षा

भोर की प्रतीक्षा

टहनी पर बैठा
चिड़िया का जोड़ा
प्रतीक्षा में है
चाँद के ढलने की,
नक्षत्र विसर्जन की..
क्यूंकि तब भोर होगी,
सूर्योदय पर
प्रातः-प्रार्थनाएं होंगी,
नव प्रभात जन्मेगा..

मगर कहीं
मृत्यु का देवता,
लील तो नहीं लेगा
जीवन इनका,
निष्ठुर, हृदयहीन होकर..
ये चन्द्र-दर्शन
अंतिम हो शायद,
लगता है यह रात्रि
कभी भोर प्राप्त
नहीं करेगी..

#राहुल

पुनर्जन्म

पुनर्जन्म

एक

होंठों से
चुनकर,
कण्ठ में
रख लो;
विष नहीं मैं
हलाहल सा..
हृदय में
न रख लेना,
कहीं जन्म
न पडूँ
गर्भ से तुम्हारे

प्रेम बनकर।


दो

फिर जन्मूँगा
मौन से तुम्हारे
किलकारी बन,
अभी समय
चलने का है..
सौंदर्य को
मृत्यु के
परखने दो..
रोको मत मुझे
बहकर भावों में
बिलखने दो

मुझे चलने दो..


#राहुल

Thursday, April 23, 2015

ये रात नहीं कटती

ये रात नहीं कटती

एक जोड़ी आँखें
झांकती झिर्री से
दरवाज़े की..
इस रात के
खत्म होने की
आस फिर एक बार
अपने अंत को है।


खरोंचों के निशान,
जो दिखते हैं
इस दरवाज़े पर
अपना मुंह सिए हैं..
कुछ चीखें,
थपथपाहट के साथ
जब्त सी होकर
रह गयी हैं कमरे में..


हर कोने से
राह ढूंढने की
कुछ कोशिशें,
नाकाम सी होकर
दीवारों से
पुताई के साथ
उतरी जाती हैं


एक ये रात
जो नहीं कटती,
एक ये सूरज
जो नहीं दिखता,
एक वो सुबह
जो नहीं होती..


#राहुल

पतंगे का आत्म-समर्पण

पतंगे का आत्म-समर्पण


विचित्र है मार्ग,
धूल-मिट्टी भरा,
अग्नि-मिश्रित हो
कीचड़ से सना;
जिससे होकर
जाना है मुझे..

यह गन्तव्य नहीं,
न रहा इच्छित कभी,
किन्तु उस ओर
सूर्य प्रतीक्षा करता,
बाट देखता जैसे मेरी..

उच्छल रत्नाकर ज्यों
स्वागत करे सरि का,
वैसे अग्नि-सागर भी तो
प्रसन्न होगा
एक पागल पतंगे के
आत्म-समर्पण पर..

#राहुल

Sunday, April 19, 2015

फाटक

फाटक

दो भिन्न
विश्व दिखते हैं
यहां मुझे
जहां खड़ा
प्रतीक्षा में
पथ चुनने को..
एक महीन सा
मार्ग जो खुलता है
इस दुनिया में
बना देता है
यहीं का हमें..

दूसरा वो विश्व
छूट जाता है
पीछे कहीं
धुंधला सा जाता है
चमक में।
क्या कष्ट होगा,
जब यहां से
वापस जाना होगा..
पार कर
उस फाटक को
जहां से आये थे..

#राहुल

Sunday, April 12, 2015

फिर मिलेंगे

फिर मिलेंगे


हमारा सम्बन्ध
भौतिक ही जाना
तुमने शायद..
कभी आँख बन्द कर
मुझमें डूब,
देखा तो होता
युगों का थका
पथिक अपनी
सम्पूर्ण यात्रा का
विवरण लिए
उपस्थित मिलता।

तुम लेकिन
मुझसे ज़्यादा
भटकी हो
खोज में मेरी शायद।
चलो..
एक युग
तुम और जी लो
एक युग मैं
और मर जाता हूँ।
मिलेंगे फिर
जीवन रहा तो
ब्रह्माण्ड के
किसी और छोर में
किसी और युग में।


#राहुल

Wednesday, April 1, 2015

मैं कोहिनूर हूँ

मैं कोहिनूर हूँ


अमूल्य हूँ
अद्भुत हूँ
विकट
विराट
और
अनूप हूँ
अतुलनीय
अप्रतिम
अद्वितीय हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।

यात्रा मेरी
अजब निराली,
न जन्म ज्ञात
न गन्तव्य
न मध्य ही
कान्ति निराली
कौस्तुभ सी
एक जन्म में
जिए सैकड़ों
हर जन्म की
अलग कहानी
हर कहानी में
अवर्णनीय हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।

नाम अनेक
सम्बन्ध अनेक
कृष्ण से ख़लजी तक
नादिर से अब्दाली तक
गया जहाँ भी 
विशेष हूँ
क्यूंकि
मैं कोहिनूर हूँ।

जग के लिए अमोल
विलक्षण हूँ
पाना चाहे
जिसे सब कोई
वो धन हूँ
धर न सके
जिसे कोई
जल जाएँ
जिसके ताप से
रत्न वो
अभिशप्त हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।



#राहुल

उस क्षण

उस क्षण


उस क्षण भी
चल रही होंगी
सांसे,
जिस क्षण
थक कर
थमना चाहेंगी ये..

उस क्षण भी
पलकें खुली होंगी
प्रतीक्षा में,
देखने की तुम्हें
वापस एक बार..

जी पडूंगा
एक बार फिर
तुम्हारा स्पर्श पाकर
मर जाने के बाद भी
तुममें, मैं होकर..


...मुझमें तुम तो
चिरकाल से
जीती आयी हो..

#राहुल