Sunday, March 29, 2015

रात की वेदना

रात की वेदना


काली श्याम रातों का सच
जानते हो?
या यूँ ही सोया है उन्हें
जीवन की तरह?
किसी बुज़ुर्ग से
सुना था मैंने भी।
सब अपने थे
रात के कुनबे में भी..

फिर एक दिन
स्वर्ण-प्रभा युक्त
दिन बिम्बित हुआ
और ललचा कर
सब अपने
एक-एक कर
छूटते गए,
छोड़ते गए साथ रात का..
तब से आज तक,
रात नहीं चमकती।

चन्द्र की सांत्वना भी
उसका दुःख नहीं
बाँट सकती।
छूट जाता है
ये साथ भी
रात अमावस को,
रह जाती है रात अकेली
अपने अकेलेपन पे रोती
सितारों के साथ..

ये नक्षत्र-सितारे
आंसू हैं उसके
जो जमे हैं
अँधेरे की चादर पर
चमकते.. झिलमिलाते..
रात की वेदना से महकते..



#राहुल

Tuesday, March 24, 2015

अदला-बदली


एक

रूह के जलने की सी
बू आती है आजकल
उस कमरे से,
उतरे थे एक दूसरे में जहाँ
जिस्म छोड़कर..


भभक कर जल उठा है
वो चाँद जो रोशन था,
तेरे वस्ल के वायदे से
आज दिन क़यामत का है
कल रात हक़ीक़त की थी।



दो

अजीब हैं न प्यार में
अदला-बदली के रवाज़..

पहले
दिल के बदले दिल
सुकून के बदले सुकून
रातों के बदले रात
और फिर..
जद्दोजहद
ये सब
वापस पाने की..


#राहुल

चाँद तक सड़क

चाँद तक सड़क



सैकड़ों पत्थर
जमा किये थे
मैंने अपने
बस्ते में
बचपन से,
कोई पूछता
तो बताता कि
सड़क बनानी है
एक चाँद तक।


जा चुके जो
लोग दूर वहां
मुझे भी जाना
है उन तक
उसी सड़क
से चलकर..


कुछ दिनों से
मरम्मत चल रही है
सड़क की,
बस्ते से जब
निकाली तो
टूटी हुई थी।

#राहुल

अग्नि-गर्भा

अग्नि-गर्भा


भस्म लिपटा तन मेरा..
पड़ा अधजली लकड़ियों में जैसे,
करता प्रतीक्षा तुम्हारी..
छुड़ा दो इस मृत्यु बेला से मुझे
बनकर मेरी अग्नि-गर्भा..


भटकता शून्य में जन्मों से
आदि-नाद सा..
स्फुटित खोजता प्रत्येक पर्ण
प्रत्येक कण में
अस्तित्व स्वयम् का..
भिन्न हो तुमसे..


असफल रहा अन्वेषण ये
विफल हुआ हर कारण ये
पृथक् हुआ जो तुमसे
शव ही तो हूँ..
मुक्ति-कामना में रत प्रतिपल
भटकता इस अजनबी हाट में
प्रतीक्षा में तेरी,


आ अब तो प्रीत मेरी
जन्म-जन्म की
बनकर मेरी अग्नि-गर्भा..



#राहुल

Monday, March 16, 2015

जीवन-मृत्यु



जीवन-मृत्यु



एक


अंधकूप में भटकता मैं
टटोलता स्वयम् को ही,
मूल्यों की क़ीमत पर,
कभी आदर्शों की..
स्वार्थ-सिद्धि की मात्र कभी।
जीवन यदि यही सब है,
तो मृत्यु क्या है



दो

सितारों की पांत
के दूसरे छोर
पर मिलूंगा मैं
जब अंत करूँगा
कल्पों से चली
आ रही हमारी
यात्रा का।

इस छोर से
चले आना
जीवन के लिए,
क्यूंकि
मृत्यु भी तो
जीवन है।


तीन

ऐसे ही हैं हम
सदियों, कल्पों, युगों से
पूरक बन एक दूसरे के
टटोलते एक दूजे में
एक बिन दूसरा
अस्तित्वहीन
मैं बुत हूँ..
तू रूह

#राहुल

Sunday, March 15, 2015

मेरे कमरे से

मेरे कमरे से


देखना..
किसी कोने में
एक मुट्ठी ज़िन्दगी
शायद पड़ी मिले
मेरे कमरे में,
किसी दरीचे के नीचे
या बस्ते की
किसी जेब में
थोडा सा सकूं
ठूंस के रखा हुआ..
वादों की शक़्ल में
कुछ धुआं मिलेगा
दीवारों पर चिपका..


जिस दिन मेरा कमरा
खोला जायगा
और निकाली जायगी
मेरी लाश,
उस रोज़ कमरे से
ढेर सारी यादें भी
निकलेंगी और कुछ
घुटी हुई शाम,
जिनकी सीलन से
दम घुंट के मरा
हूँ मैं।


#राहुल

Monday, March 9, 2015

मुद्दतें तो हुई होंगी न

मुद्दतें तो हुई होंगीं न





मुद्दतें तो हुई होंगी न,
जब हम मिले थे
झील के किनारे
उस सितारों वाली रात तले..


चाँद जो टँगा था
आसमान की दीवार पे
घड़ी सा गोल
तकता हमें
बादलों की खिड़की से..


शिकारे से तुमने
जो हथेली अपनी
डाली थी झील के पानी में
एक भीनी सी खुशबू
तैर चली सेहरा की गोद में..


आ जाओ कि,
राह तकता मैं
बूढ़ी हो चली पलकों से
रूह ढो रहा हूँ
ज़िन्दगी यहीं कहीं
दफ़न की थी न तुमने,
छुड़ा दो रूह को
एक बार फिर जिस्म छूकर..



#राहुल

Thursday, March 5, 2015

फीका फाल्गुन सूखा मन

फीका फाल्गुन सूखा मन


एक

पिचकारी, गुब्बारे
रंग, गुलाल, गुंझिया
यही है होली बस क्या.

या बच्चों का फेंका वो रंग
जो मेरी कमीज़ पे गिरकर
अक़्स उकेर देता है तुम्हारे चेहरे का।


दो

एक पुड़िया गुलाल
जो भेजा था तुमने
सहेली के हाथ
कुछ फीका सा है
रंग उसका आज..

अगर तुम आ जाओ
फाग खेलने
तो छूकर
अपनी हथेलियों से
मुझे रंगीन कर दो..


तीन

इस होली इच्छा है कि 
आसमान जब मुझपे बरसे
तो ऐसे कि उतर जाये रंग तेरा
वो जो चढ़ा है मुझपे ऐसे कुछ
जैसे आत्मा पर देह-आवरण..



#राहुल

Tuesday, March 3, 2015

अधूरी कविता

अधूरी कविता


कुछ पुरानी कविताएँ
पड़ी हैं मेज की दराज़ में
जिन्हें बुनना छोड़ दिया था,
आज अचानक बोल पड़ी;
तो याद आ गये तुम..


मैं भी तो वो कविता हूँ
जिसे कहा नहीं तुमने,
प्रतीक्षा में बैठा हूँ
अनगढ़ा, अनकहा, अपूर्ण..
सहस्राब्दियों से, युगों से..


#राहुल