Saturday, February 28, 2015

जा चुके थे तुम

जा चुके थे तुम


स्वयम् के
झंझावातों से मुक्ति पा,
जब तक पलट कर
देख सकता,
जा चुके थे तुम।


कितनी छोटी थी
वो अवधि
जब तुम और मैं,
अपनी सीमाओं से 
बाहर आकर
हम हुए।


क्रांति करते विचार
जब देह की शिथिलता
पर प्रश्न उठाते हैं,
ठगा सा रह जाता हूँ ,
स्वयम् के ही हाथों।
निःशब्द, निरुत्तर..


क्या बदला तुम्हारे जाने से..
क्या तुम, क्या मैं
या क्रूर नियति?
या ये सब चाहते हैं
बदलना एक-दूसरे को।


देह की पीड़ा जब
बनकर मन की भी,
जीत लेती है  प्राणों को,
तब श्याम-श्वेत सा
लगने लगता है जीवन
यकायक..


बोझिल हो चले
इस जीवन-क्रम में
हवाऐं लेकर नमी
मेरी आँखों से,
जा चुकीं हैं
जीवन को
रंग सलेटी देकर..


#राहुल

Thursday, February 19, 2015

निर्भय पथ

निर्भय पथ


कण्टकों की छाँव में
पुष्पित किसी पल्लव सा
मन तू खिला चल
पक्षियों के कलरव सा।


हो तम घनेरा सब ओर भले
हो जग विरुद्ध जब यह बात चले
निश्चय कर दृढ़ हृदय में
आगे तू बढ़े सिंह सा।


कोटि सम सर्प दंश लिए
उर में भय अनन्त लिए
कर शंखनाद तू रण मध्य
हो उन्मत्तों के विजय पर्व सा।


दुर्ग अभेद्य हों तो क्या
प्रवाह प्रतिकूल हो तो क्या
तू रहे सदा अविजित बन
जीवन समर मध्य 'कृष्ण' सा।


#राहुल

Saturday, February 14, 2015

पेड़, पाषाण और मैं

पेड़, पाषाण और मैं


देखो पेड़ के सामने पड़े
उस सलेटी पाषाण खण्ड को,
जो साक्षी था
हमारे मिलन का..
यहीं बैठकर युगों
गुज़ारे थे न हमने,
कुछ गूंगा सा हो गया है
आजकल।


और वो ठूँठ,
जो पेड़ हुआ करता,
जिसके पीछे
जा छुपती तुम
मुझे सताने को,
सूखा सा रहता है
आजकल
बसन्त में भी।


यह पत्थर और पेड़
मूक साक्ष्य हैं
हर उस पल के
जब तुम साथ होकर भी
साथ नहीं होती।
इसी पेड़ की छाँह तले
रोज़ तपता हूँ मैं
हज़ारों बार ढूंढ चुका हूँ
तुम मिलती ही नहीं यहां अब।


नहीं जानता था
कि कुछ पल
ख़ामोशी के छीन लेंगे
तुम्हें मुझसे,
लौट आओ न
कि देखो तुम्हारे बिन
ये पत्थर भी रोने लगा है,
और मैं..
शिला सा हो गया हूँ।

#राहुल

Tuesday, February 10, 2015

कुछ कतरे समन्दर के

कुछ कतरे समन्दर के


सैकड़ों कतरा बूंदें
क़ैद हैं इन आँखों में,
रुंधे गले से निकली
कोई आहट, जैसे
तोड़ना चाहती हो
सैलाब इन बूंदों का..

बड़े यत्न से
सम्भाल कर,
बड़े मनौवल कर,
जाने कैसे अटकाए हूँ
ख़ुद को वर्तमान की
खूँटी से..

उम्मीद है
किसी दिन
कहीं तुम्हारा
स्पर्श पाऊँगा
तो छूटूंगा इस
वंचना से।

तुम्हारा सामीप्य
ईश्वर जाने
कब हो,
हो भी या नहीं..
किन्तु जब भी हो,
ऐसा हो जो
मुक्त कर दे
समन्दर इन आँखों ..


#राहुल

Friday, February 6, 2015

जलता है चाँद

जलता है चाँद


आज फिर
आसमान में
छाई लाली,
आज फिर
पत्थरों पर
तेरा ही
अक़्स उभरता है..

आज फिर
तेरा ही
ज़िक्र करती
ये रात की रानी,
हवा में
नशा सा
घोलती है..

हवा के 
चीरते सन्नाटे
छूकर मुझे
छील सा
जाते हैं
जब तेरी
ज़ुल्फ़ों की सी
खुशबू सौंधी
उनसे गुज़रती है


पिघलता मैं
भी हूँ
कांच सा
जब-जब
हथेली पर
तेरी उँगलियाँ
महसूस करता हूँ..

आज फिर
पत्थरों पर
तेरा ही
अक़्स उभरता है
इस जलते चाँद की
रात तले।


#राहुल