Saturday, January 31, 2015

तेरे बिन

तेरे बिन

आकाश में छाई
रक्तिम आभा..
किसी झील पर
जमी हुई बर्फ..
बिलकुल अपनी सी
कहानी लगते हैं।

जहाँ तुम मेरे
सन्नाटों को तोड़ती
मेरे विचारों को खोलतीं,
कुछ यूँ जैसे
ऊष्मित होकर
कुसुम दल खिलते है।

याद है तुम्हे
ये कुहरा..
मेरे मन के
उन प्रश्नों जैसा
जो छाया रहता
घनघोर नियमित।

देखो,
इन ओस की बूंदों को
तुम्हारे गालों पर गिरे
आंसुओं सी..
हाँ पहचानता तो हूँ
इन्हें मैं।

सुनो ध्यान से
इस चीरती सी
हवा को..
कानों से उतरकर
सीधे आत्मा
तक पहुंचती
तुम्हारे वादों को कहती..

और ये बर्फ..
देखो न
जम सी गयी है
मेरी सांसों सी,
तुम्हारे स्पर्श
के बिन।

#राहुल

Friday, January 30, 2015

कहाँ हूँ मैं

कहाँ हूँ मैं

तुम्हारी बातों से शुरू हुए
हमारे किस्से में,
मैं बातों से शुरू होकर तुम्हारी,
तुम्हारे ही किस्सों में खो गया।

आवाज़ तो दो,
के कहाँ हूँ
कहीं तुम ही में तो नहीँ
या खो चुका हूँ फिर
अपनी नियति के
उसी काले अध्याय
के किसी उपांश में
जहाँ खो चुका हूँ
मैं सैकड़ों बार
पहले भी।

मिलना कठिन होता है
फिर भी मिल ही जाता हूँ,
विधाता की अँगुलियों
में फंसा,
स्वयं की मुक्ति
की कामना में
या तुम ही में
कहीं ढूँढ पाऊं
स्वयं को।
शायद प्रेम से ही मुक्ति
संभव हो।

ढूंढता हूँ
खुद को, कि
कहाँ हूँ मैं..


#राहुल

तुम्हारी खोज में

तुम्हारी खोज में


मैं यायावर
भटकता फिरूँ
तेरी खोज में..
या उसकी,
जो मिला दे
तुझसे।

किसी मृग
की भांति,
जो भागा फिरता है
स्वयं के ही
एक अंश-प्रतिरूप
के पीछे।

या किसी
अन्वेषक
की भांति,
जो
सूत्र जोड़ता
फिरता है
स्व-इच्छित
की प्राप्ति हेतु।

कहीं कोई
प्रेमी रूठ
गया हो जैसे,
उसे मनाने
के यत्नों
में जुटे
उस पागल
की भांति,
जिसे समग्र
विश्व दृष्टिगत
होता हो
स्वयं के
ही प्रिय की
प्रसन्नता में।

या उस
रोगी सा,
जो शय्या
पर पड़ा
बाट देख
रहा हो
किसी चिकित्सक
की वा
मृत्यु की,
जो छुड़ा सके
उसे असाध्य
जर से।

मैं यायावर
भटकता फिरूं
तेरी चाह में..

#राहुल

चलते-चलते


चलते-चलते

मुझमें कोई थक जाता है चलते-चलते,
रहगीर मुसाफ़िर बदले जाते रस्ते-रस्ते।
हर बार लगे यूँ न जाने क्यूं,
इस बार तो मन्ज़िल मिल जायेगी हंसते-हंसते।


कोई बताता बंध जन्म का कोई ऊपर वाले का लेख,
कोई खेल करम का बतला जाता रमते-रमते।
मुझपे गुज़री कोई न जाने,
कोई प्राण 'फ़क़ीरा' तन रह जाता है जलते-जलते।


#राहुल

Thursday, January 29, 2015

परिवर्तन

परिवर्तन


सृष्टि के निर्माण का आधार,
क्या सदैव अपेक्षित परिणाम
और वांछित प्रदान करता है..
या कभी कुछ तोड़ भी देता है
किसी के भीतर।

सृष्टा के अंश
से उत्पन्न मनुष्य
अंगीकार नहीं कर सकता
प्रत्येक परिवर्तन को,
तो भी उसे सब
करना पड़ता है शिरोधार्य।

यह नीति विधाता की है,
या तथाकथित
पुराण-सत्य
कि मानव
सब सहता है
स्व-कर्मों के अनुसार।

रचयिता के इस
एकल मनोरंजन
में मनुष्य कौन..
यदि मात्र कठपुतली

तो दोषी कौन..


#राहुल

Tuesday, January 27, 2015

गणतन्त्र

गणतन्त्र


दिवस दिनांक मात्र रह गया

कैसा ये गणतंत्र..
कौन यहाँ पर हुआ सुखी
और कौन हुआ स्व-तन्त्र..

निरंकुश शासक, निश्चिन्त नागरिक,

विचित्र हुआ सब तन्त्र..
'दुर्गा' मांगे स्वयं सुरक्षा
'सिंह' हुए परतन्त्र..

स्वाभिमान सब चढ़ गया वेदी

ठौर ढूंढें सब 'मन्त्र'..
क्षण यही वह जब सब विचारें
करें प्रयास एकत्र..

न करें व्यर्थ बलिदान

'दधीच' का
शुभ करें गणतन्त्र।


#राहुल

Sunday, January 25, 2015

अजनबी दुनिया

अजनबी दुनिया

दुनिया में आ के कुछ
डर सा गया हूँ..
कि जब से आया हूँ
सब देख रहा हूँ..
हिंसा,
घृणा,
स्वार्थ;
कुछ नहीं है,तो बस
प्रेम।

मेरा घर
कितना अलग,
कितना अच्छा था..
जहाँ आशा थी,
प्रत्याशा थी,
जीवन था,
न पाखंड था न फ़रेब;
था, तो
सिर्फ प्रेम।

यहाँ धर्म है,
किन्तु अनुचर धन का।
विश्वास है,
किन्तु साथी भय का।
स्वार्थ-पूर्ती में
आवश्यकतानुसार
जिसे तोड़ा-मरोड़ा जाये
वो है,
बस प्रेम।

सम्बन्धों में
मिथ्या-गरिमा है,
छलना है,
भ्रम है,
आडम्बर है,
झूठी कर्त्तव्यनिष्ठा है;
यदि कुछ नहीं है..
तो बस,
प्रेम।

ये स्वयं का घर
छोड़कर
कहाँ आ गया मैं,
जहाँ सब कुछ है;
कुछ नहीं है,
तो बस प्रेम।


#राहुल

बसन्त

बसन्त


सरसों के फूलों
से रंग बसन्ती
लेकर भर दो
उस जीवन में
जो रिक्त सा,
श्वेत सा पड़ा
है एक तुम्हारे
बिन।

पतझड़ का
ये मौसम
कभी तो
खत्म होगा
यूँ ही वीरान
पड़ा है जो
सदियों से
बिन तुम्हारे।

#राहुल

Saturday, January 24, 2015

अंतर्यात्रा

अंतर्यात्रा

स्वयं की यात्रा भी
कितनी विचित्र
होती है..
अपरिचित सा
रहता है
कभी कभी
सब ज्ञात
होकर भी।

गलियों, सड़कों,
शिवालों, बाज़ारों,
और कण-कण में
खोजने से भी
जिस महा-रहस्य को
नहीं ढूंढ पाता,

पर्वतों, नदियों
घाटियों, सागरों
आकाश, धरा 
में भी वो
मेरा मौन सरीखा
दृष्टिगत होता है।

सहज ही
स्वयं में स्वयं को
ढूँढते-ढूंढते
तुम जो 
आ मिले मुझसे 
मेरी कल्पों से चली
आ रही यात्रा
को गन्तव्य
मिल गया मानो।

ये अकल्प्य था,
अनूठा सा 
अहसास..
जिसे जिया तो
स्वयम् को जिया
और नहीं जिया
तो व्यर्थ गया सब।

कितनी विचित्र
होती है ये
स्वयं की
यात्रा भी..


#राहुल

अनंत की यात्रा पर

अनंत की यात्रा

मृत्यु से भी परे
कोई विश्व है शायद..
जहाँ हम चले जाते हैं
अपनी यात्रा का
एक सोपान पूरा करके।

सम्बन्धों का मेला
ठहर जाता है यहीं।
लोग कहते हैं
कुछ साथ नहीं जाता;
फिर भी..
कुछ तो साथ जाता होगा
इस विश्व से दूर..
अनंत तक।

ब्रह्माण्ड की गतिशीलता
के नियम को
सत्यापित करता,
मनुष्य की कल्पना को
विराम देता मृत्यु-पल,
जो ले चलता है
मनुष्य को
अनंत छोर तक।

धरा पर जन्मते ही
प्रारम्भ हो चुकती है
वो यात्रा
जिसके लिए
समाप्त होना होता है
और चलना पड़ता है
फिर
एक अनंत यात्रा पर।

मृत्यु से भी परे
एक विश्व है।


#राहुल