Saturday, October 10, 2015

सुलगती बर्फ़

सुलगती बर्फ़


एक.


हवा बहने लगी
सरस फिर..
पन्छी चहके,
देह सप्राण हुई;
भान हुआ जीवन
दौड़ने का
धमनियों में
एक बार पुनः..

हर कर्म सृष्टि का
चलने लगा नियत
गति, नियम से..

शब्द भी उन्मुक्त हो
छूट चले
अनन्त आकाश में,

जुड़ी रह गई जो
दो जोड़ी आँखें
वो फिर,
जुदा न हो सकीं..


दो.


घर की छत से
चिपकी बर्फ़
अभी बूंदें बनकर
गिरना शुरू
नहीं हुई है,
घण्टाघर से दिखती
चांदी की हिमवर्तिका
पिघलकर बहना
शुरू नहीं हुई है..

शाम का धुंधलका
गहराते बादलों सङ्ग
रात हो चला है
शून्य टकराकर
वापस लौटता है देह से..

तुमने इसे नहीं छुआ,
रक्त दौड़ना
शुरू नहीं हुआ;

देह जड़ है अभी..


#राहुल

Wednesday, July 22, 2015

अम्मा जी के भगीरथ

अम्मा जी के भगीरथ


   बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखूं। अवसर, लेखनी और करीबी जब प्रेरित करते हैं तो शब्द सहसा फूट ही पड़ते हैं। फिर लिखते, न समय का भान रहता है न माहौल का। खैर.. अधिक भूमिका न बांधते हुए सीधे मुद्दे पर आता हूँ। लिखने का निश्चय किया तो मन में आया कि कैसे कल्पना करूँ.. कैसे विषय तलाशूं.. फिर सूझा, यथार्थ से श्रेष्ठ कभी कुछ नहीं हो सकता लिखने को।

   स्थान के नाम का उल्लेख नहीं कर रहा हूँ..  सोचता हूँ कि स्थान नाम लेने से घटना व उसकी प्रासंगिकता सीमित हो सकती है।

    आज गंगा-दशहरे के दिन जिले के कलक्टर साहब के सम्मान समारोह में मंच लगाया गया है। दर्शक-दीर्घा की प्रथम पांत में गाँव के भूतपूर्व सरपंच व उनका परिवार, शहर कोतवाल महोदय तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति बैठाये गए हैं। बैरिकेडिंग की गई है जिसके पीछे गाँव के लोग बड़ी संख्या में अपने जिलाधिकारी को देखने, सुनने आए हुए हैं। गाँव में सरकारी अस्पताल का शिलान्यास करने का उनका कार्यक्रम है साथ ही जिलाधिकारी महोदय का सम्मान भी गाँव की ओर से रखा गया है। दरअसल कलक्टर साहब गांव के भूतपूर्व सरपंच के सुपुत्र हैं। कुछ सात-आठ साल पहले गाँव से बड़ी पढ़ाई करने शहर चले गए थे। तब से सारा परिवार शहर ही रहता है।

   अचानक कलक्टर साहब मंच पर नमूदार होते हैं और उनके साथ सफ़ेद चिट्टी साड़ी में गौरवर्ण एक अम्मा जी हैं जिनको देखकर सबके ज़हन में कब की दफ़न एक कहानी ताज़ा हो जाती है। कई साल पहले उन्हें गाँव से निकाल दिया गया था। अम्मा को गाँव से निकाले जाने के बाद से अब तक किसी ने कभी उन्हें इस तरह नहलाये धुलाये हुए.. नए कपड़ों में नहीं देखा था।

     उनका नाम क्या था, कोई जानता नहीं था या लेता नहीं था या लेना नहीं चाहता था..नहीं पता.. कुछ पैंतीस एक साल हुए इस घटना की शुरुआत होती है। उनको सन्तान नहीं थी। पति की भी असामयिक मृत्यु हो चुकी थी। जैसा निःसन्तान स्त्री से अपेक्षा की जाती है, कि उन्हें बच्चों से चिढ़ होगी इसके उलट बच्चों से बड़ा लगाव था उन्हें। अचानक गाँव में महामारी हुई। बच्चों की मौतें होने लगी। उन्होंने अपनी तरफ़ से बच्चों का उपचार करने की बड़ी कोशिश की मगर पंचायत में उन्हें दोषी ठहराकर हुक्का पानी बन्द करा दिया गया; वजह नहीं पता, ऐसा क्यों हुआ। खैर.. मौतों का सिलसिला अभी रुका नहीं और उन्हें डायन करार देकर पत्थर मार-मारकर गाँव से बाहर निकाल दिया गया। सारा गाँव उन्हें अब डायन कहता था। तबसे उनका ठिकाना गाँव से बाहर वाला मन्दिर ही था। उनसे डरकर गाँव की महिलाओं ने उस ओर बच्चे भेजने बन्द ही कर दिए थे। इन वर्षों में गाँव के कुछ बच्चे चोरी छुपे उन तक खाना पहुंचाते रहे। लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव इस दौरान कभी नहीं दीखा। किसी ने बच्चों को मन्दिर की ओर देखा तो सख्त हिदायतों, नसीहतों के साथ कभी कभी थप्पड़, चप्पल या डण्डी से ख़बर ली जाती थी। लेकिन बच्चों का मन्दिर उनके पास जाने का क्रम नहीं रुका। अब तक बच्चे उन्हें 'मन्दिर वाली अम्मा' कहकर बुलाने लगे थे.. पर लोगों के कानों और मुँहों से सफ़र करती अम्मा की कहानी में कुछ भी नहीं बदला।

   यह घटना अब तक किस्सा बन चुकी थी। लोगों की कानाफूसियों के बीच कलक्टर साहब अम्मा को कुर्सी पर बैठाकर उनके बराबर वाली कुर्सी पर बैठते हैं। सम्मान के बाद कलक्टर साहब को दो शब्द बोलने को आमन्त्रित किया जाता है। अम्मा की तरफ़ देखकर, मुस्कुराकर कलक्टर साहब माइक सम्भालते हैं और कहते हैं, " आज बहुत ख़ुश हूँ जिसके लिए शब्द थोड़े हैं। वर्षों बाद मैं उस मिट्टी की गोद में हूँ जहाँ खेल-कूदकर बड़ा हुआ। गाँव में सरकारी अस्पताल की कमी थी.. पूरी करना चाहता था। पूरी कर भी दी आज। आपको आज अस्पताल के साथ वो वजह भी देता हूँ जिसने मुझे इस ओर प्रेरित किया.. अम्मा। अम्मा वो वजह हैं जिन्होंने मुझे सही मायनों में सिविल सर्विस करना सिखाया। अम्मा यहां मंच पर मेरे साथ हैं, इन्होंने अपना सारा जीवन इस गाँव को दिया है। कहने को सारा जिला मेरे अधीन होता है, इसीलिए अपने गाँव की तरफ़ से.. अपने पिता.. परिवार की तरफ़ से होने वाले इनके अपमान के लिए मैं इनके चरण छूकर क्षमा मांगता हूँ।" कहते हुए कलक्टर साहब की आवाज़ भर्रा गयी थी और वो अम्मा के चरण छू रहे थे। वो दृश्य सबने देखा जब अम्मा का हाथ कलक्टर साहब के सर पर जा पहुंचा और उनकी आँखों से मानो गंगा छूट पड़ी हो पर चेहरे के भाव अब भी शून्य थे। जनसमूह सन्न था। वहीं खड़े होकर कलक्टर साहब फिर बोले, "जिस माँ की गोद में हम पल-खेलकर बड़े हुए, जब उस माँ को सामूहिक रूप से अपमानित किया गया तब कुछ नहीं कर पाये। आज जब इस योग्य इनके आशीर्वाद से बने हैं तो इन्हें इनका खोया सम्मान ज़रूर वापस मिले। मैं आप सबको बताता हूँ यदि ये वो होती.. जो गाँव ने इन्हें सारी उमर बोला.. समझा तो आज मैं आप सबके सामने न होता। रोज़ाना दिन में एक बार इन्हीं के हाथ से भोजन कर इनके बारे में देखा.. समझा। जब सारा गाँव बच्चों की मौतों से परेशान था तो इन्होंने अपने हाथों से दवाइयाँ बना कर बच्चों को बचाने की कोशिश की। मैं आप सबसे पूछता हूँ क्या किसी की उस तपस्या का फल उसे अपमानित करके दिया जाना चाहिए.." आज पण्डाल में मौजूद हर शख़्स जो उस घटनाक्रम से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़ा रहा, शायद अपराध-बोध था उसको.. निरुत्तर थे सब। केवल कलक्टर साहब का चेहरा तेज से दमक रहा था। ऋण-मुक्त होने का गौरव था आज उनके मुख पर.. बोले, " आज गंगा दशहरा के दिन यदि माता के ऋण को चुका पाया तो जीवन सफल समझूँगा.. ये अस्पताल इन माँ को समर्पित करता हूँ.. चाहता हूँ कि इनके हाथों से ही इस पुण्य-कर्म का शुभारम्भ हो.. साथ ही यह भी चाहूँगा कि यहां मरीजों को ठीक करने का ज़िम्मा ये सम्भालें। अस्पताल की केयर-टेकिंग के लिए मैं इन्हें आमन्त्रित करता हूँ।" अम्मा जी के चेहरे पर प्रथम बार मुस्कान दिखाई दी पर आंसुओं के साथ।

   लगता था कि आज अम्मा जी के आंसू नहीं साक्षात् गंगा मैया प्रवाहित हो रही हैं। अम्मा बरसों से रुके अपने आंसू जाने क्यूं नहीं रोक पा रही थी। आज अम्मा के आंसुओं में उनका दुःख, उनका अपमान, शायद सब बह जाने वाला था.. बचने वाला था तो बस गंगा की सी निर्मलता लिए अम्मा और अपने बाप-दादाओं के किये अपराधों के क्षमापन पर अम्मा को सम्मान गाँव वापस लाने वाले कलक्टर साहब।

    सच मायनों में हुए न कलक्टर साहब "अम्मा के भगीरथ.."



#राहुल

Sunday, July 5, 2015

खड़ा मिलूंगा मार्ग में

खड़ा मिलूंगा मार्ग में

एक

खड़ा मिलूंगा
भरे तूणीर और
खिंची प्रत्यंचा के साथ,
मार्ग के अवरोध
अब और नहीं
रोक सकते
कठोर प्रहार मेरे
बहुत हो चुका
प्रलाप समय का..

सहस्रों बार
पहले भी
नियति के
निष्ठुर प्रलोभन दिखा
छला जा चुका मुझे..

राह में अब
न सागर, न ही शैल
रोक सकते
बाणों के कठोर प्रहार
यही अब
प्रतीक होगा
प्रेम की सज्जता का
जिसे धारण कर
बन अर्जुन
साथ रहूंगा
हर जन्म मैं..


दो

मिलता तो हूँ तुम्हें
जब सीमायें, वर्जनाएं,
थाम नहीं पातीं,
प्रवाह सा
छूट जाता हूँ
किसी नदी के
जो सभी किनारों,
बांधों को तोड़
जा मिले
अपनी नियति से..

तब कहाँ स्वयम् रहता हूँ..
तुम सा हो जाता हूँ,
तुम हो जाता हूँ
तुममें डूब कर..


कभी न पृथक् होने के लिए..



#राहुल

Sunday, June 14, 2015

बादल




एक

रात को आया
रुई का एक फाहा
खिड़की पे
चाँद के साथ

ठहरा रहा कुछ पल
आती जाती हवाओं से
उलझा.. टूटा..
ख़ुद से छूटा

तुमने देखा तो
बादल बन गया।




दो

बारिश की
सैकड़ों बूंदों से
अनछुआ
हथेली पर
एक स्पर्श
मात्र तुम्हारा..

भिगा जाता है
किसी को
मुझी में

तकता रह जाता है
बादल आसमान से
सूखा सा..


तीन

आँखों के
फैले काजल से
सफेद चमकती
चादर पर खींच
कुछ बादल
जो भेजे थे तुमने
शहर के ऊपर से
निकल गए..

एक बार फिर
उन्हें स्पीड-पोस्ट से
भेज दो न..


#राहुल

Friday, May 22, 2015

ख़्वाहिश सूरज की

ख़्वाहिश सूरज की


एक

कमरे का ताप
बढ़ सा गया है
बीते कुछ दिनों में,
पसीना हसरतों का
छूटते जाता है..

ज़र्द हिस्सों में
उड़ता मैं पतँगों सा..
बंटा ख़ुद ही की
ख्वाहिश में..

एक सूरज जलाकर
रखा था दीये में
उजालों के लिए..



दो

अजीब है
रात का होना,
उससे भी अधिक
सुबह का होना..

एक सूरज की 
बाट देखती रात
ढलना चाहती है अब..

सितारों के
बोझ तले दबकर
यूँ कुछ कि फिर
कोई रात न हो..

          
#राहुल

Sunday, May 17, 2015

विदाई का सूर्य

विदाई का सूर्य

एक

किसी पिघलती
शाम में दूर
क्षितिज पर,
जिस पल सूर्य
उद्यत होता है
समुद्र के जल में
समाहित होने को..
चलता जाता है वह
प्रतिपल निरन्तर जैसे
घर जाने की जल्दी में..

सूर्य को उस
विदा करते पल भी,
किनारों की
गीली रेत पर
रह जाते हैं,
मूक प्रत्यक्ष-दर्शी बन
दो जोड़ी पांवों
के निशान..
धीमे धीमे जो
बढ़ते जाते
एक दूजे की ओर
एक होने को..

दो

आओ बैठो
पास मेरे
ये खाली कुर्सी
खींचकर..

काफी दिनों से
कुछ धूप
इकट्ठा कर
रखी है
बोतल में।

एक सूरज
पड़ा है वहां
कोने में किसी,
अपनी टूटी
किनोरों के साथ..




#राहुल

यात्रा का सम्भाव्य

यात्रा का सम्भाव्य

न तारों की छाया
न सूर्य की धूप ही
किसी पथिक की
यात्रा के अन्वेषक बन
तय कर पाते हैं
यात्रा का सम्भाव्य..

ये तो निर्भर है
मात्र पथिक की
लकुटी के साहस
और बटोही का
गन्तव्य के प्रति
उसे प्राप्त करने के
प्रयोजन पर..

अनिच्छित इच्छित
प्रतिकूल अनुकूल
हो जाएँ.. विषमताएं
सब गम्य हो जाएँ
यदि लक्ष्य को
प्राप्त करना
नैसर्गिक हो,
बिलकुल किसी
सूर्य के ताप
प्राप्त करने जैसा
या तारों के
शीतल छाया
चुनने जैसा..

#राहुल

Saturday, May 16, 2015

तुम

तुम


एक दायरा सा होता है लोगों का.. मेरे चारों तरफ.. एक हुजूम; जब तुम करीब होती हो.. यादों में ही सही। फिर कोई आश्चर्य नहीं कि अचानक इतना खालीपन.. तुम्हारे करीब न होने की सोच से भी। इतना तो बनता है, जब अचानक सारी दुनिया तुम अकेले को किसी मरु, निर्जन वन या टापू पर छोड़कर चली गयी हो। समस्त विश्व का खालीपन उस समय मेरे चेहरे की नीरवता से प्रकट होता है। जहां समुद्र हैं, मगर सूखे.. पर्वत हैं, किन्तु झुके.. कोलाहल है, किन्तु अश्रुत। चन्द्र है, सूर्य है, नक्षत्र हैं.. पर निस्तेज। बड़ी विचित्र दशा। ऐसे में कोई हाल पूछे तो क्या बताऊँ समझ से परे है।

Saturday, May 9, 2015

माँ

माँ

छत पर
खाली पड़े
टब में
चार बिलोटने
दिए बिल्ली ने
दो एक रोज़ पहले..
उछलते थे
कूदते थे
मिमियाते,
गुर्राते थे,
लड़ते थे
अपनी माँ
के संग..

कुछ बीमार से
हैं कल से..
उछलना
कूदना
खेलना
खो सा गया कहीं..
न खाते हैं
न पीते हैं
ग़ौर किया
तो पाया
बिन माँ
के हैं..

बिल्ली शायद
चली गयी है कहीं..

#राहुल

Monday, May 4, 2015

आत्मगीत

आत्मगीत


कुछ धुनें
रख ली हैं
चुराकर
शब्दों से
तुम्हारे,
कहे थे
जो कभी
किसी
युग में
कानों में
मेरे..

आज,
युगों बाद
भी सहेज
रखे हैं
प्रतीक्षा में,
तुम्हारे श्वासों
की उष्णता की;
आतुर हैं मेरे
कानों से
पिघलकर
अंतर तक
जाने को
बन कर
मेरा आत्मगीत।


#राहुल

Friday, April 24, 2015

क्या पता

क्या पता

सुबह कल की
सुनहरी हो
क्या पता..

रात आज
कितनी गहन हो
क्या पता..

चाँद का साथ
नहीं लाज़िम,
सितारे भी संग रहें
क्या पता..

दिन गुज़रे तो
एक अरसा हुआ,
रात भी कट पायेगी
क्या पता..

#राहुल

भोर की प्रतीक्षा

भोर की प्रतीक्षा

टहनी पर बैठा
चिड़िया का जोड़ा
प्रतीक्षा में है
चाँद के ढलने की,
नक्षत्र विसर्जन की..
क्यूंकि तब भोर होगी,
सूर्योदय पर
प्रातः-प्रार्थनाएं होंगी,
नव प्रभात जन्मेगा..

मगर कहीं
मृत्यु का देवता,
लील तो नहीं लेगा
जीवन इनका,
निष्ठुर, हृदयहीन होकर..
ये चन्द्र-दर्शन
अंतिम हो शायद,
लगता है यह रात्रि
कभी भोर प्राप्त
नहीं करेगी..

#राहुल

पुनर्जन्म

पुनर्जन्म

एक

होंठों से
चुनकर,
कण्ठ में
रख लो;
विष नहीं मैं
हलाहल सा..
हृदय में
न रख लेना,
कहीं जन्म
न पडूँ
गर्भ से तुम्हारे

प्रेम बनकर।


दो

फिर जन्मूँगा
मौन से तुम्हारे
किलकारी बन,
अभी समय
चलने का है..
सौंदर्य को
मृत्यु के
परखने दो..
रोको मत मुझे
बहकर भावों में
बिलखने दो

मुझे चलने दो..


#राहुल

Thursday, April 23, 2015

ये रात नहीं कटती

ये रात नहीं कटती

एक जोड़ी आँखें
झांकती झिर्री से
दरवाज़े की..
इस रात के
खत्म होने की
आस फिर एक बार
अपने अंत को है।


खरोंचों के निशान,
जो दिखते हैं
इस दरवाज़े पर
अपना मुंह सिए हैं..
कुछ चीखें,
थपथपाहट के साथ
जब्त सी होकर
रह गयी हैं कमरे में..


हर कोने से
राह ढूंढने की
कुछ कोशिशें,
नाकाम सी होकर
दीवारों से
पुताई के साथ
उतरी जाती हैं


एक ये रात
जो नहीं कटती,
एक ये सूरज
जो नहीं दिखता,
एक वो सुबह
जो नहीं होती..


#राहुल

पतंगे का आत्म-समर्पण

पतंगे का आत्म-समर्पण


विचित्र है मार्ग,
धूल-मिट्टी भरा,
अग्नि-मिश्रित हो
कीचड़ से सना;
जिससे होकर
जाना है मुझे..

यह गन्तव्य नहीं,
न रहा इच्छित कभी,
किन्तु उस ओर
सूर्य प्रतीक्षा करता,
बाट देखता जैसे मेरी..

उच्छल रत्नाकर ज्यों
स्वागत करे सरि का,
वैसे अग्नि-सागर भी तो
प्रसन्न होगा
एक पागल पतंगे के
आत्म-समर्पण पर..

#राहुल

Sunday, April 19, 2015

फाटक

फाटक

दो भिन्न
विश्व दिखते हैं
यहां मुझे
जहां खड़ा
प्रतीक्षा में
पथ चुनने को..
एक महीन सा
मार्ग जो खुलता है
इस दुनिया में
बना देता है
यहीं का हमें..

दूसरा वो विश्व
छूट जाता है
पीछे कहीं
धुंधला सा जाता है
चमक में।
क्या कष्ट होगा,
जब यहां से
वापस जाना होगा..
पार कर
उस फाटक को
जहां से आये थे..

#राहुल

Sunday, April 12, 2015

फिर मिलेंगे

फिर मिलेंगे


हमारा सम्बन्ध
भौतिक ही जाना
तुमने शायद..
कभी आँख बन्द कर
मुझमें डूब,
देखा तो होता
युगों का थका
पथिक अपनी
सम्पूर्ण यात्रा का
विवरण लिए
उपस्थित मिलता।

तुम लेकिन
मुझसे ज़्यादा
भटकी हो
खोज में मेरी शायद।
चलो..
एक युग
तुम और जी लो
एक युग मैं
और मर जाता हूँ।
मिलेंगे फिर
जीवन रहा तो
ब्रह्माण्ड के
किसी और छोर में
किसी और युग में।


#राहुल

Wednesday, April 1, 2015

मैं कोहिनूर हूँ

मैं कोहिनूर हूँ


अमूल्य हूँ
अद्भुत हूँ
विकट
विराट
और
अनूप हूँ
अतुलनीय
अप्रतिम
अद्वितीय हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।

यात्रा मेरी
अजब निराली,
न जन्म ज्ञात
न गन्तव्य
न मध्य ही
कान्ति निराली
कौस्तुभ सी
एक जन्म में
जिए सैकड़ों
हर जन्म की
अलग कहानी
हर कहानी में
अवर्णनीय हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।

नाम अनेक
सम्बन्ध अनेक
कृष्ण से ख़लजी तक
नादिर से अब्दाली तक
गया जहाँ भी 
विशेष हूँ
क्यूंकि
मैं कोहिनूर हूँ।

जग के लिए अमोल
विलक्षण हूँ
पाना चाहे
जिसे सब कोई
वो धन हूँ
धर न सके
जिसे कोई
जल जाएँ
जिसके ताप से
रत्न वो
अभिशप्त हूँ
मैं कोहिनूर हूँ।



#राहुल

उस क्षण

उस क्षण


उस क्षण भी
चल रही होंगी
सांसे,
जिस क्षण
थक कर
थमना चाहेंगी ये..

उस क्षण भी
पलकें खुली होंगी
प्रतीक्षा में,
देखने की तुम्हें
वापस एक बार..

जी पडूंगा
एक बार फिर
तुम्हारा स्पर्श पाकर
मर जाने के बाद भी
तुममें, मैं होकर..


...मुझमें तुम तो
चिरकाल से
जीती आयी हो..

#राहुल

Sunday, March 29, 2015

रात की वेदना

रात की वेदना


काली श्याम रातों का सच
जानते हो?
या यूँ ही सोया है उन्हें
जीवन की तरह?
किसी बुज़ुर्ग से
सुना था मैंने भी।
सब अपने थे
रात के कुनबे में भी..

फिर एक दिन
स्वर्ण-प्रभा युक्त
दिन बिम्बित हुआ
और ललचा कर
सब अपने
एक-एक कर
छूटते गए,
छोड़ते गए साथ रात का..
तब से आज तक,
रात नहीं चमकती।

चन्द्र की सांत्वना भी
उसका दुःख नहीं
बाँट सकती।
छूट जाता है
ये साथ भी
रात अमावस को,
रह जाती है रात अकेली
अपने अकेलेपन पे रोती
सितारों के साथ..

ये नक्षत्र-सितारे
आंसू हैं उसके
जो जमे हैं
अँधेरे की चादर पर
चमकते.. झिलमिलाते..
रात की वेदना से महकते..



#राहुल

Tuesday, March 24, 2015

अदला-बदली


एक

रूह के जलने की सी
बू आती है आजकल
उस कमरे से,
उतरे थे एक दूसरे में जहाँ
जिस्म छोड़कर..


भभक कर जल उठा है
वो चाँद जो रोशन था,
तेरे वस्ल के वायदे से
आज दिन क़यामत का है
कल रात हक़ीक़त की थी।



दो

अजीब हैं न प्यार में
अदला-बदली के रवाज़..

पहले
दिल के बदले दिल
सुकून के बदले सुकून
रातों के बदले रात
और फिर..
जद्दोजहद
ये सब
वापस पाने की..


#राहुल

चाँद तक सड़क

चाँद तक सड़क



सैकड़ों पत्थर
जमा किये थे
मैंने अपने
बस्ते में
बचपन से,
कोई पूछता
तो बताता कि
सड़क बनानी है
एक चाँद तक।


जा चुके जो
लोग दूर वहां
मुझे भी जाना
है उन तक
उसी सड़क
से चलकर..


कुछ दिनों से
मरम्मत चल रही है
सड़क की,
बस्ते से जब
निकाली तो
टूटी हुई थी।

#राहुल

अग्नि-गर्भा

अग्नि-गर्भा


भस्म लिपटा तन मेरा..
पड़ा अधजली लकड़ियों में जैसे,
करता प्रतीक्षा तुम्हारी..
छुड़ा दो इस मृत्यु बेला से मुझे
बनकर मेरी अग्नि-गर्भा..


भटकता शून्य में जन्मों से
आदि-नाद सा..
स्फुटित खोजता प्रत्येक पर्ण
प्रत्येक कण में
अस्तित्व स्वयम् का..
भिन्न हो तुमसे..


असफल रहा अन्वेषण ये
विफल हुआ हर कारण ये
पृथक् हुआ जो तुमसे
शव ही तो हूँ..
मुक्ति-कामना में रत प्रतिपल
भटकता इस अजनबी हाट में
प्रतीक्षा में तेरी,


आ अब तो प्रीत मेरी
जन्म-जन्म की
बनकर मेरी अग्नि-गर्भा..



#राहुल

Monday, March 16, 2015

जीवन-मृत्यु



जीवन-मृत्यु



एक


अंधकूप में भटकता मैं
टटोलता स्वयम् को ही,
मूल्यों की क़ीमत पर,
कभी आदर्शों की..
स्वार्थ-सिद्धि की मात्र कभी।
जीवन यदि यही सब है,
तो मृत्यु क्या है



दो

सितारों की पांत
के दूसरे छोर
पर मिलूंगा मैं
जब अंत करूँगा
कल्पों से चली
आ रही हमारी
यात्रा का।

इस छोर से
चले आना
जीवन के लिए,
क्यूंकि
मृत्यु भी तो
जीवन है।


तीन

ऐसे ही हैं हम
सदियों, कल्पों, युगों से
पूरक बन एक दूसरे के
टटोलते एक दूजे में
एक बिन दूसरा
अस्तित्वहीन
मैं बुत हूँ..
तू रूह

#राहुल

Sunday, March 15, 2015

मेरे कमरे से

मेरे कमरे से


देखना..
किसी कोने में
एक मुट्ठी ज़िन्दगी
शायद पड़ी मिले
मेरे कमरे में,
किसी दरीचे के नीचे
या बस्ते की
किसी जेब में
थोडा सा सकूं
ठूंस के रखा हुआ..
वादों की शक़्ल में
कुछ धुआं मिलेगा
दीवारों पर चिपका..


जिस दिन मेरा कमरा
खोला जायगा
और निकाली जायगी
मेरी लाश,
उस रोज़ कमरे से
ढेर सारी यादें भी
निकलेंगी और कुछ
घुटी हुई शाम,
जिनकी सीलन से
दम घुंट के मरा
हूँ मैं।


#राहुल

Monday, March 9, 2015

मुद्दतें तो हुई होंगी न

मुद्दतें तो हुई होंगीं न





मुद्दतें तो हुई होंगी न,
जब हम मिले थे
झील के किनारे
उस सितारों वाली रात तले..


चाँद जो टँगा था
आसमान की दीवार पे
घड़ी सा गोल
तकता हमें
बादलों की खिड़की से..


शिकारे से तुमने
जो हथेली अपनी
डाली थी झील के पानी में
एक भीनी सी खुशबू
तैर चली सेहरा की गोद में..


आ जाओ कि,
राह तकता मैं
बूढ़ी हो चली पलकों से
रूह ढो रहा हूँ
ज़िन्दगी यहीं कहीं
दफ़न की थी न तुमने,
छुड़ा दो रूह को
एक बार फिर जिस्म छूकर..



#राहुल

Thursday, March 5, 2015

फीका फाल्गुन सूखा मन

फीका फाल्गुन सूखा मन


एक

पिचकारी, गुब्बारे
रंग, गुलाल, गुंझिया
यही है होली बस क्या.

या बच्चों का फेंका वो रंग
जो मेरी कमीज़ पे गिरकर
अक़्स उकेर देता है तुम्हारे चेहरे का।


दो

एक पुड़िया गुलाल
जो भेजा था तुमने
सहेली के हाथ
कुछ फीका सा है
रंग उसका आज..

अगर तुम आ जाओ
फाग खेलने
तो छूकर
अपनी हथेलियों से
मुझे रंगीन कर दो..


तीन

इस होली इच्छा है कि 
आसमान जब मुझपे बरसे
तो ऐसे कि उतर जाये रंग तेरा
वो जो चढ़ा है मुझपे ऐसे कुछ
जैसे आत्मा पर देह-आवरण..



#राहुल

Tuesday, March 3, 2015

अधूरी कविता

अधूरी कविता


कुछ पुरानी कविताएँ
पड़ी हैं मेज की दराज़ में
जिन्हें बुनना छोड़ दिया था,
आज अचानक बोल पड़ी;
तो याद आ गये तुम..


मैं भी तो वो कविता हूँ
जिसे कहा नहीं तुमने,
प्रतीक्षा में बैठा हूँ
अनगढ़ा, अनकहा, अपूर्ण..
सहस्राब्दियों से, युगों से..


#राहुल

Saturday, February 28, 2015

जा चुके थे तुम

जा चुके थे तुम


स्वयम् के
झंझावातों से मुक्ति पा,
जब तक पलट कर
देख सकता,
जा चुके थे तुम।


कितनी छोटी थी
वो अवधि
जब तुम और मैं,
अपनी सीमाओं से 
बाहर आकर
हम हुए।


क्रांति करते विचार
जब देह की शिथिलता
पर प्रश्न उठाते हैं,
ठगा सा रह जाता हूँ ,
स्वयम् के ही हाथों।
निःशब्द, निरुत्तर..


क्या बदला तुम्हारे जाने से..
क्या तुम, क्या मैं
या क्रूर नियति?
या ये सब चाहते हैं
बदलना एक-दूसरे को।


देह की पीड़ा जब
बनकर मन की भी,
जीत लेती है  प्राणों को,
तब श्याम-श्वेत सा
लगने लगता है जीवन
यकायक..


बोझिल हो चले
इस जीवन-क्रम में
हवाऐं लेकर नमी
मेरी आँखों से,
जा चुकीं हैं
जीवन को
रंग सलेटी देकर..


#राहुल

Thursday, February 19, 2015

निर्भय पथ

निर्भय पथ


कण्टकों की छाँव में
पुष्पित किसी पल्लव सा
मन तू खिला चल
पक्षियों के कलरव सा।


हो तम घनेरा सब ओर भले
हो जग विरुद्ध जब यह बात चले
निश्चय कर दृढ़ हृदय में
आगे तू बढ़े सिंह सा।


कोटि सम सर्प दंश लिए
उर में भय अनन्त लिए
कर शंखनाद तू रण मध्य
हो उन्मत्तों के विजय पर्व सा।


दुर्ग अभेद्य हों तो क्या
प्रवाह प्रतिकूल हो तो क्या
तू रहे सदा अविजित बन
जीवन समर मध्य 'कृष्ण' सा।


#राहुल

Saturday, February 14, 2015

पेड़, पाषाण और मैं

पेड़, पाषाण और मैं


देखो पेड़ के सामने पड़े
उस सलेटी पाषाण खण्ड को,
जो साक्षी था
हमारे मिलन का..
यहीं बैठकर युगों
गुज़ारे थे न हमने,
कुछ गूंगा सा हो गया है
आजकल।


और वो ठूँठ,
जो पेड़ हुआ करता,
जिसके पीछे
जा छुपती तुम
मुझे सताने को,
सूखा सा रहता है
आजकल
बसन्त में भी।


यह पत्थर और पेड़
मूक साक्ष्य हैं
हर उस पल के
जब तुम साथ होकर भी
साथ नहीं होती।
इसी पेड़ की छाँह तले
रोज़ तपता हूँ मैं
हज़ारों बार ढूंढ चुका हूँ
तुम मिलती ही नहीं यहां अब।


नहीं जानता था
कि कुछ पल
ख़ामोशी के छीन लेंगे
तुम्हें मुझसे,
लौट आओ न
कि देखो तुम्हारे बिन
ये पत्थर भी रोने लगा है,
और मैं..
शिला सा हो गया हूँ।

#राहुल

Tuesday, February 10, 2015

कुछ कतरे समन्दर के

कुछ कतरे समन्दर के


सैकड़ों कतरा बूंदें
क़ैद हैं इन आँखों में,
रुंधे गले से निकली
कोई आहट, जैसे
तोड़ना चाहती हो
सैलाब इन बूंदों का..

बड़े यत्न से
सम्भाल कर,
बड़े मनौवल कर,
जाने कैसे अटकाए हूँ
ख़ुद को वर्तमान की
खूँटी से..

उम्मीद है
किसी दिन
कहीं तुम्हारा
स्पर्श पाऊँगा
तो छूटूंगा इस
वंचना से।

तुम्हारा सामीप्य
ईश्वर जाने
कब हो,
हो भी या नहीं..
किन्तु जब भी हो,
ऐसा हो जो
मुक्त कर दे
समन्दर इन आँखों ..


#राहुल

Friday, February 6, 2015

जलता है चाँद

जलता है चाँद


आज फिर
आसमान में
छाई लाली,
आज फिर
पत्थरों पर
तेरा ही
अक़्स उभरता है..

आज फिर
तेरा ही
ज़िक्र करती
ये रात की रानी,
हवा में
नशा सा
घोलती है..

हवा के 
चीरते सन्नाटे
छूकर मुझे
छील सा
जाते हैं
जब तेरी
ज़ुल्फ़ों की सी
खुशबू सौंधी
उनसे गुज़रती है


पिघलता मैं
भी हूँ
कांच सा
जब-जब
हथेली पर
तेरी उँगलियाँ
महसूस करता हूँ..

आज फिर
पत्थरों पर
तेरा ही
अक़्स उभरता है
इस जलते चाँद की
रात तले।


#राहुल

Saturday, January 31, 2015

तेरे बिन

तेरे बिन

आकाश में छाई
रक्तिम आभा..
किसी झील पर
जमी हुई बर्फ..
बिलकुल अपनी सी
कहानी लगते हैं।

जहाँ तुम मेरे
सन्नाटों को तोड़ती
मेरे विचारों को खोलतीं,
कुछ यूँ जैसे
ऊष्मित होकर
कुसुम दल खिलते है।

याद है तुम्हे
ये कुहरा..
मेरे मन के
उन प्रश्नों जैसा
जो छाया रहता
घनघोर नियमित।

देखो,
इन ओस की बूंदों को
तुम्हारे गालों पर गिरे
आंसुओं सी..
हाँ पहचानता तो हूँ
इन्हें मैं।

सुनो ध्यान से
इस चीरती सी
हवा को..
कानों से उतरकर
सीधे आत्मा
तक पहुंचती
तुम्हारे वादों को कहती..

और ये बर्फ..
देखो न
जम सी गयी है
मेरी सांसों सी,
तुम्हारे स्पर्श
के बिन।

#राहुल

Friday, January 30, 2015

कहाँ हूँ मैं

कहाँ हूँ मैं

तुम्हारी बातों से शुरू हुए
हमारे किस्से में,
मैं बातों से शुरू होकर तुम्हारी,
तुम्हारे ही किस्सों में खो गया।

आवाज़ तो दो,
के कहाँ हूँ
कहीं तुम ही में तो नहीँ
या खो चुका हूँ फिर
अपनी नियति के
उसी काले अध्याय
के किसी उपांश में
जहाँ खो चुका हूँ
मैं सैकड़ों बार
पहले भी।

मिलना कठिन होता है
फिर भी मिल ही जाता हूँ,
विधाता की अँगुलियों
में फंसा,
स्वयं की मुक्ति
की कामना में
या तुम ही में
कहीं ढूँढ पाऊं
स्वयं को।
शायद प्रेम से ही मुक्ति
संभव हो।

ढूंढता हूँ
खुद को, कि
कहाँ हूँ मैं..


#राहुल

तुम्हारी खोज में

तुम्हारी खोज में


मैं यायावर
भटकता फिरूँ
तेरी खोज में..
या उसकी,
जो मिला दे
तुझसे।

किसी मृग
की भांति,
जो भागा फिरता है
स्वयं के ही
एक अंश-प्रतिरूप
के पीछे।

या किसी
अन्वेषक
की भांति,
जो
सूत्र जोड़ता
फिरता है
स्व-इच्छित
की प्राप्ति हेतु।

कहीं कोई
प्रेमी रूठ
गया हो जैसे,
उसे मनाने
के यत्नों
में जुटे
उस पागल
की भांति,
जिसे समग्र
विश्व दृष्टिगत
होता हो
स्वयं के
ही प्रिय की
प्रसन्नता में।

या उस
रोगी सा,
जो शय्या
पर पड़ा
बाट देख
रहा हो
किसी चिकित्सक
की वा
मृत्यु की,
जो छुड़ा सके
उसे असाध्य
जर से।

मैं यायावर
भटकता फिरूं
तेरी चाह में..

#राहुल

चलते-चलते


चलते-चलते

मुझमें कोई थक जाता है चलते-चलते,
रहगीर मुसाफ़िर बदले जाते रस्ते-रस्ते।
हर बार लगे यूँ न जाने क्यूं,
इस बार तो मन्ज़िल मिल जायेगी हंसते-हंसते।


कोई बताता बंध जन्म का कोई ऊपर वाले का लेख,
कोई खेल करम का बतला जाता रमते-रमते।
मुझपे गुज़री कोई न जाने,
कोई प्राण 'फ़क़ीरा' तन रह जाता है जलते-जलते।


#राहुल

Thursday, January 29, 2015

परिवर्तन

परिवर्तन


सृष्टि के निर्माण का आधार,
क्या सदैव अपेक्षित परिणाम
और वांछित प्रदान करता है..
या कभी कुछ तोड़ भी देता है
किसी के भीतर।

सृष्टा के अंश
से उत्पन्न मनुष्य
अंगीकार नहीं कर सकता
प्रत्येक परिवर्तन को,
तो भी उसे सब
करना पड़ता है शिरोधार्य।

यह नीति विधाता की है,
या तथाकथित
पुराण-सत्य
कि मानव
सब सहता है
स्व-कर्मों के अनुसार।

रचयिता के इस
एकल मनोरंजन
में मनुष्य कौन..
यदि मात्र कठपुतली

तो दोषी कौन..


#राहुल

Tuesday, January 27, 2015

गणतन्त्र

गणतन्त्र


दिवस दिनांक मात्र रह गया

कैसा ये गणतंत्र..
कौन यहाँ पर हुआ सुखी
और कौन हुआ स्व-तन्त्र..

निरंकुश शासक, निश्चिन्त नागरिक,

विचित्र हुआ सब तन्त्र..
'दुर्गा' मांगे स्वयं सुरक्षा
'सिंह' हुए परतन्त्र..

स्वाभिमान सब चढ़ गया वेदी

ठौर ढूंढें सब 'मन्त्र'..
क्षण यही वह जब सब विचारें
करें प्रयास एकत्र..

न करें व्यर्थ बलिदान

'दधीच' का
शुभ करें गणतन्त्र।


#राहुल

Sunday, January 25, 2015

अजनबी दुनिया

अजनबी दुनिया

दुनिया में आ के कुछ
डर सा गया हूँ..
कि जब से आया हूँ
सब देख रहा हूँ..
हिंसा,
घृणा,
स्वार्थ;
कुछ नहीं है,तो बस
प्रेम।

मेरा घर
कितना अलग,
कितना अच्छा था..
जहाँ आशा थी,
प्रत्याशा थी,
जीवन था,
न पाखंड था न फ़रेब;
था, तो
सिर्फ प्रेम।

यहाँ धर्म है,
किन्तु अनुचर धन का।
विश्वास है,
किन्तु साथी भय का।
स्वार्थ-पूर्ती में
आवश्यकतानुसार
जिसे तोड़ा-मरोड़ा जाये
वो है,
बस प्रेम।

सम्बन्धों में
मिथ्या-गरिमा है,
छलना है,
भ्रम है,
आडम्बर है,
झूठी कर्त्तव्यनिष्ठा है;
यदि कुछ नहीं है..
तो बस,
प्रेम।

ये स्वयं का घर
छोड़कर
कहाँ आ गया मैं,
जहाँ सब कुछ है;
कुछ नहीं है,
तो बस प्रेम।


#राहुल

बसन्त

बसन्त


सरसों के फूलों
से रंग बसन्ती
लेकर भर दो
उस जीवन में
जो रिक्त सा,
श्वेत सा पड़ा
है एक तुम्हारे
बिन।

पतझड़ का
ये मौसम
कभी तो
खत्म होगा
यूँ ही वीरान
पड़ा है जो
सदियों से
बिन तुम्हारे।

#राहुल

Saturday, January 24, 2015

अंतर्यात्रा

अंतर्यात्रा

स्वयं की यात्रा भी
कितनी विचित्र
होती है..
अपरिचित सा
रहता है
कभी कभी
सब ज्ञात
होकर भी।

गलियों, सड़कों,
शिवालों, बाज़ारों,
और कण-कण में
खोजने से भी
जिस महा-रहस्य को
नहीं ढूंढ पाता,

पर्वतों, नदियों
घाटियों, सागरों
आकाश, धरा 
में भी वो
मेरा मौन सरीखा
दृष्टिगत होता है।

सहज ही
स्वयं में स्वयं को
ढूँढते-ढूंढते
तुम जो 
आ मिले मुझसे 
मेरी कल्पों से चली
आ रही यात्रा
को गन्तव्य
मिल गया मानो।

ये अकल्प्य था,
अनूठा सा 
अहसास..
जिसे जिया तो
स्वयम् को जिया
और नहीं जिया
तो व्यर्थ गया सब।

कितनी विचित्र
होती है ये
स्वयं की
यात्रा भी..


#राहुल

अनंत की यात्रा पर

अनंत की यात्रा

मृत्यु से भी परे
कोई विश्व है शायद..
जहाँ हम चले जाते हैं
अपनी यात्रा का
एक सोपान पूरा करके।

सम्बन्धों का मेला
ठहर जाता है यहीं।
लोग कहते हैं
कुछ साथ नहीं जाता;
फिर भी..
कुछ तो साथ जाता होगा
इस विश्व से दूर..
अनंत तक।

ब्रह्माण्ड की गतिशीलता
के नियम को
सत्यापित करता,
मनुष्य की कल्पना को
विराम देता मृत्यु-पल,
जो ले चलता है
मनुष्य को
अनंत छोर तक।

धरा पर जन्मते ही
प्रारम्भ हो चुकती है
वो यात्रा
जिसके लिए
समाप्त होना होता है
और चलना पड़ता है
फिर
एक अनंत यात्रा पर।

मृत्यु से भी परे
एक विश्व है।


#राहुल